हम नहीं,तो कौन फ़िक़र करेगा अपने ही पानी की ?

मैं मध्य प्रदेश में रहता हूँ.अपनी आँखों देखी पर,मैंने आसपास के सभी प्रदशों में चर्चाएं की हैं.कमोबेश स्थितियां समान हैं.इसलिए मेरी बात को भारत के सम्पूर्ण मध्य भाग की स्थिति मान लें,तो बिलकुल गलत नहीं होगा. अभी तो नवम्बर ही आया है,और प्रदेश में पानी का संकट,अपने पैर पसारते हुए दिखने लगने लगा है.मध्यप्रदेश में कुल लगभग 241 मध्यम या बड़े जलाशय हैं,जिनमें से 35 जलाशय अपनी क्षमता के 25 प्रतिशत या कुछ तो इससे भी काफी कम भर पाए हैं,86 बाँध 25 से 75 प्रतिशत तक भरे हैं व 120 यानी कुल संख्या के आधे 75 से 90 प्रतिशत तक भर पाए हैं.इसका मतलब यह हुआ कि तथाकथित सिंचित क्षेत्र में भी,हम इसी रबी की पूरी फसल को पानी नहीं दे सकते.कुओं और हैंडपम्पों ने भी जवाब देना शुरू कर दिया है.

प्रदेश का जल संसाधन विभाग अपने साधनों से गाँव-गाँव खबर कराने की तैयारी में है,कि रबी में किसान वही फसल लें,जिनमें पानी कम लगे. यही नहीं,वे लोग भी चिंतित हैं,जिन्हें इसी महीने में हो रहे विधानसभा चुनाव में,मतदान का प्रतिशत बढ़ाने का लक्ष्य मिला है.क्योंकि,दरवाजे पर आ चुके जल-संकट को देखते हुए,गाँवों से पलायन शुरू हो चुका है. मैं नहीं कहता,कि आप श्री राहुल गांधी की बात मान ही लें,पर खुद भी तो जाकर देख सकते हैं,कि उज्जैन में क्षिप्रा का जल,देखने में ही कष्ट होता है.
आपने अखबारों में यह भी पढ़ ही लिया होगा कि देवास जिले में क्षिप्रा का जल काला पड़ गया है,व मछलियां और कछुवे मर रहे हैं.यही पानी देवास को पीना भी है.लगभग यही कहानी पूरे प्रदेश में,सब जगह की है.

मैं यह भी नहीं कहता कि अपने-अपने जलाशयों में हम ही लोगों ने पीओपी की खतरनाक रसायन लगी देव मूर्तियां विसर्जित की हैं,इसीलिए ऐसा हुआ होगा.लेकिन,वह भी एक कारण तो है,पर बड़ा कारण है छोटी नदियों की अविरलता की समाप्ति. इनकी समाप्त हुई अविरलता या बहाव की समाप्ति के कारण ही इन नदियों की मुख्य नदियाँ भी संकट में आ गई हैं.साथ ही भू-जल भी बहुत नीचे जा रहा है.यह छोटी मोटी चिंता की बात नहीं है,यह अपने सबके अस्तित्व या जीवन से जुड़ा सवाल है.
पानी पर जिंदगी भर काम कर चुके,और पानी की समझ रखने वाले भू-जल वैज्ञानिक श्री कृष्ण गोपाल व्यास,जिनसे बात कर ही,मैं यह लिख रहा हूँ,कहते हैं कि अपने यहाँ मोटा-मोटी या मुख्यतः जल संचय और उपयोग का जिम्मा दो ही विभागों के पास है.जल संसाधन विभाग का काम पानी को जलाशयों में रोकना,रोके गये पानी के उपयोग का हिसाब रखना और नहरों के जरिये खेतों तक पहुँचाना है.साथ ही वे नहरों और बांधों की मरम्मत भी करते हैं.दूसरा विभाग है लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी,जो उपलब्ध पानी को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाता है व बसाहटों में वितरण कर देता है.इन दोनों का दायित्व उपलब्ध पानी पर ही काम करने का है,लेकिन,इसमें नदियों और अन्य जल स्त्रोतों का पुनर्जीवन कहाँ है ? जबकि अपने यहाँ,ये तो निरंतर मर रहे हैं व इनका पानी रोज,कभी न बढ़ने के लिए घटता ही जा रहा है.

नदियों की अविरलता और अन्य जल संरचनाओं का पुनर्जीवन,पवित्रता और निर्मलता तो किसी के भी जिम्मे नहीं है.श्री व्यास कहते हैं कि नदी की अस्मिता,उसकी अविरलता,निर्मलता,अक्षत जैव-विविधता और पवित्रता से ही बचती है.सारी छोटी या सहायक नदियों का निरंतर बहाव ही बड़ी नदियों को जिन्दा रखता है. यह काम पता नहीं क्यों,सरकारों की प्राथमिकता में नहीं है.शायद वे जानती ही नहीं हैं कि इस मामले में उनका सही दायित्व क्या है.इसलिए,जीने-मरने के इस सवाल पर इस सवाल पर समाज को ही सोचना और सहयोग करना पड़ेगा या जिम्मा लेना होगा.

स्व.अनुपम मिश्र कहा करते थे कि अच्छे लोग भी जब राज के करीब पहुँचते हैं,तो उन्हें विकास और भूमंडलीकरण का रोग लग जाता है व वे हजारों हजार साल के प्रकृति के नियमों को तोड़ने लगते हैं.जबकि पानी प्रकृति का प्रसाद है,उसका प्रबंध भी प्रकृति को ही करने दिया जाना चाहिए.हमने शायद,प्रकृति के विरूद्ध जाकर अपनी ही बर्बादी की है. याद रखें,बरसात की मात्रा का सीधा सम्बन्ध जलस्त्रोतों में उपलब्ध पानी से नहीं है.इसका ताज़ा तरीन उदाहरण केरल है.इस साल केरल में सामान्य से 36 प्रतिशत अधिक बारिश हुई थी.उसकी तबाही का भीषणतम मंज़र हमने भी देखा है,किन्तु सितम्बर के तीसरे हफ्ते में ही वहां नदियों,कुओं और तालाबों में पानी कम हो गया था.साथ ही भू-जल भी बिलकुल नहीं बढ़ा.ऊपर से,अति वर्षा से खेती की जमीनें अलग बर्बाद हो गईं. यदि आज स्व.अनुपम मिश्र जिन्दा होते तो अपना खुद का कहा एक वाक्य जरूर याद करते कि ‘प्रभु’का काम प्रभु(प्रकृति)को ही करने दें,सुरेश प्रभु को न सौंपें (जो काम आजकल श्री नितिन गडकरी को मिला है,अनुपमजी के समय वही काम सुरेश प्रभु के पास था).

आप ही बताएं कि इस समस्या पर अपने समाज ने या इसके धार्मिक और आध्यात्मिक नेतृत्व ने कभी कोई गंभीर चर्चा की ? जल संरचनाओं को पूजने की बात अलग है,पर उनसे आदरपूर्वक,उनके लिए तय अनुशासनयुक्त व्यवहार हमने कभी किया ?
सरकारें पश्चिम से सीखकर हम पर ‘जनभागीदारी,बीओटी,बीओओटी या पीपीपी जैसे जुमले तो चस्पा कर देती हैं,लेकिन ऐसा कोई काम नहीं करती,जिससे जनता खुद जिम्मेदारी से अपनी निकटतम या पूज्य नदी की अविरलता,निर्मलता या अक्षत जैव-विविधता के लिए काम करे. कितनों को पता है कि किसी विरोधी की ‘परकम्मा यात्रा’के समय बरगी बाँध से अतिरिक्त पानी छोड़कर,अवैध खनन के शर्मनाक गड्ढे छुपाने हेतु नर्मदा को बहता हुआ दिखा दिया गया था.

जो लोग,पानी पर कुछ भी,जानते हैं,वे यह भी जानते हैं कि बरगी बाँध की दूसरी नहर,जिससे पानी कटनी की तरफ जाएगा,उसके बनने या चालू हो जाने पर नर्मदाजी का पानी पी रहे शहरों और गावों का क्या होगा ?यह कल्पना मात्र डरा देती है.
इसलिए नर्मदाजी का अस्तित्व बचाना जरूरी है,उनकी सहायक नदियों को जिन्दा करना या रखना और भी ज्यादा जरूरी है.यही बात प्रदेश की अन्य बड़ी नदियों पर लागू होती है.और यह काम करने अब कोई भगीरथ नहीं आएगा.हमें ही सब कुछ करना है. अब आधे मग्गे पानी में दाढ़ी बना लो,आधी बाल्टी पानी में नहा लो,टॉयलेट में कम पानी वापरो या आधा गिलास पानी ही पियो जैसे टोटकों से काम नहीं चलेगा. बात मानें प्रकृति के पास आपकी जरूरत का सब कुछ है,बस वह आपकी हवस पूरी नहीं कर सकती.तभी तो मारवाड़ के मरुस्थल में भी जीवन है,जो पानी से ही चलता है,और दसों किलोमीटर अंदर समुद्र में भी जीवन है,जहाँ का सारा पानी खारा है ,वहां भी जीवन है तभी तो वहां वनस्पति और जलजीव अपने अस्तित्व को बचाये रखते हैं.यही बात वहां लागू होती है जहाँ बर्फ ही बर्फ है.

अपने देश में,चूँकि पत्रकारों को दुनिया-जहान के विषयों पर लिखना-पढ़ना पड़ता है,न्यायालयों को एक सीमित लक्ष्मण रेखा के भीतर ही काम करना पड़ता है,राजनीति वालों की प्राथमिकता सत्ता पाना या उसमें बना रहना ही है व अफसरों को जो भी सिखाया गया है,उसमें पानी और प्रकृति नहीं हैं,इसीलिए सारा संकट है. एक छोटा सा निवेदन पढ़ लें,कि स्वामी सानंद(प्रो.जी डी अग्रवाल) गंगाजी की अविरलता और निर्मलता के लिए अनशन कर रहे थे और मर गए. सरकार ने अपनी चमड़ी बचाने के लिए,’रिवर बेसिन आर्गेनाईजेशन मैनेजमेंट एक्ट 2018 ‘बना दिया,और कह दिया कि हमारी गलती कहाँ है,जबकि यह पूरा का पूरा एक्ट सम्बंधित राज्यों में पानी के बंटवारे,प्रबंध,नियमन और विवाद सुलझाने के लिए होगा.इसमें भी अविरलता,निर्मलता या पुनर्जीवन की बात नहीं है. एसटीपी (सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट) लगाकर शहरों की गटर के पानी से हम गंगाजी,नर्मदाजी और क्षिप्राजी के गड्ढे तो छुपा देंगे,क्योंकि वह बहता हुआ पानी है,पर इससे उनके जल को पवित्र कैसे बनाएंगे.उनकी अस्मिता और पवित्रता कैसे लौटा पाएंगे.

हमने ही सुन रखा है कि पहले नदी,तालाब,कुँए बावड़ी सब समाज की संपत्ति होते थे.समाज ही उनकी देखभाल करता था,तो वह अब क्यों नहीं हो सकता ? देश को आज़ादी मिलने से या हम सबके ज्यादा पढ़-लिख लेने से जीने के नियम तो नहीं बदलते ? इसलिए फ़िक़र तो सबको करनी पड़ेगी.

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