क्या मालूम दालों का जहर अपने कितने पास है

न्याय यदि विलम्ब से मिले,तो वह अन्याय के समान है.लेकिन,न्याय के रास्ते में जान-बूझकर बाधा बनना एक पाप है,और मिले हुए न्याय को मानने में देर करना शायद महापाप है. आज आपको यह कहा जाय कि खेतों में अधिक उत्पादन और उससे अधिक लाभ के लिए लगभग सारी दुनिया की कृषि उपज जहरीली हो चुकी हैं,तो कोई नई बात नहीं होगी.आप और मेरे सहित दुनिया भर में सबको यह खबर,न सिर्फ है,बल्कि सब लोग इस कारण चिंतित भी हैं.
इस हफ्ते में व्हाट्सएप पर एक सन्देश दौड़ रहा था कि भारत सरकार ने लम्बी चुप्पी के बाद मान लिया है कि कनाडा और आस्ट्रेलिया से आई मूंग और मसूर दालों में उत्पादन के समय अधिक उपयोग हुए खतरनाक खरपतवारनाशक ‘ग्लाइफोसेट’के अंश हो सकते हैं. लेकिन,अपने देश में ‘खाद्य अपमिश्रण निरोधक कानून 1954 ‘ के होते हुए भी,अब कुछ नहीं हो सकता.क्योंकि,सरकार ही कह रही है कि वे दालें अब कहाँ-कहाँ पहुँच गई होंगी,उनका कितना उपयोग हो चुका होगा या वे देशी दालों के भण्डार में कितनी मिल चुकी होंगी,व्यावहारिक रूप से इस पर कुछ भी कहना या करना संभव नहीं है.

मुद्दे को इसकी जड़ से देखें.भारत कभी दालों का सबसे बड़ा उत्पादक,निर्यातक व उपभोक्ता देश रहा है.समय के चलते अब हम दालों के बड़े उत्पादक या निर्यातक तो नहीं हैं,सबसे बड़े उपभोक्ता जरूर रह गए हैं.अब हम प्रतिवर्ष औसतन 50 से 70 लाख टन दालें या दलहनी अन्न आयात करते हैं.इनमें से आधी दालें कनाडा और आस्ट्रेलिया से व शेष म्यांमार,यूक्रेन,रूस और अफ्रीकन देशों से आती हैं. कनाडा में रह रहे भारतीय मूल के कनाडाई नागरिक टोनी मित्रा (शायद उनका नाम अपने यहाँ शांतनु मित्रा था) ने आवाज उठाई कि कनाडा और आस्ट्रेलिया से भारत आ रही दालों में खरपतवारनाशक ‘ग्लाइफोसेट’के बचे हुए अंश मान्य प्रतिशत से बहुत ज्यादा हैं.दुनिया भर में सिद्ध हो चुका है कि यह रसायन मानव शरीर के लिए घातक है.बल्कि वहां की अदालतों ने इस रसायन के निर्माताओं और व्यापारियों पर भारी-भारी जुर्माने भी लगाए हैं.टोनी की मुहीम पर दोनों देशों कनाडा व आस्ट्रेलिया में निर्यात हो रही दालों के कुल 3100 नमूने लिए गए,और पाया गया कि उनमें से 30 प्रतिशत में वह जहर है.

यह,या अन्य कृषि उत्पादों में कृषि-रसायनों के जहर की बात दुनिया भर में सिद्ध होते ही,सैकड़ों कीटनाशक,फफूंदनाशक,अंकुरण नाशक और खरपतवार नाशकों पर सारी दुनिया में प्रतिबन्ध लगे.किन्तु,भारत में तब भी,उनमें से 104 बे-रोकटोक बिकते रहे.हल्ला-गुल्ला होते ही भारत सरकार ने अगस्त 2013 में इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टिट्यूट के सेवा निवृत्त प्रोफ़ेसर डॉ.अनुपम वर्मा की अध्यक्षता में एक कमेटी बना दी.पता नहीं क्यों,कमेटी ने 66 ही कृषि रसायनों पर विचार किया व वर्ष 2015 में रिपोर्ट दे दी कि भारत में बिक रहे 18 रसायनों पर तत्काल बंदिश लगाईं जाय. इस कमेटी की रिपोर्ट पर आदेश का मसौदा बना,टिप्पणियों,राज्यों और सुझावों की समीक्षा के लिए भारत सरकार ने फिर भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद के श्री जे.एस.संधू की अध्यक्षता में दिसम्बर 2016 में एक और कमेटी बना दी.संधू साहब जुलाई 2017 में रिटायर हो गए.अक्टूबर 2017 में भारत सरकार के कृषि विभाग के एग्रीकल्चर कमिश्नर एस.के.मल्होत्रा की अध्यक्षता में तीसरी बार उसी काम के लिए एक और समिति बन गई.

इस बीच चैतन्य समाज के कुछ लोगों,पीड़ितों या चिकित्सा विशेषज्ञों ने विभिन्न स्तर की अदालतों के दरवाजे खटखटाये.नवम्बर 2017 में बात उच्चतम न्यायालय के सामने पहुंची.रिट पिटीशन 1079 / 2017 में अपने यहाँ उपयोग हो रहे 99 कृषि रसायनों की बिक्री पर तत्काल पाबंदी की मांग की गई. सारे वैज्ञानिक तथ्यों,साक्ष्यों और घटनाओं को देखते हुए न्यायालय ने अगस्त ‘2018 में बारह रसायनों पर तत्काल और छह पर धीरे-धीरे, लेकिन जरूर,प्रतिबन्ध लगाने के आदेश दिए.इस बीच इसी विषय के कई अलग अलग मुक़दमे सर्वोच्च न्यायालय में लग गए हैं.

इस हफ्ते में दौड़े व्हाट्सएप सन्देश से पता चला कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का वाक़ई कुछ असर हुआ है.लेकिन,मजबूरी साथ में बता दी गई है कि उन रसायनों युक्त कनाडाई और आस्ट्रेलियन मूंग और मसूर की दालें अब कहाँ-कहाँ तक पहुँच गई हैं,राम जाने. यहाँ एक तथ्य और जान लें कि हमारे यहाँ भेजी जाने वाली दाल वहां के लोग बिलकुल नहीं खाते.बाक़ायदा नामजद,कि यह दाल निर्यात की जायेगी,की सैकड़ों एकड़ में खेती होती है व वे इस उत्पादन को अपने जानवरों को भी नहीं देते.लेकिन वे देश अपने यहाँ आने वाले खाद्यान्नों पर जरुरत से ज्यादा सतर्क और सख्त रहते हैं.शायद आप भूल गए हों,कि एक वर्ष ‘मैडकाऊ’नाम की बीमारी के शक में हमारी हज़ारों टन सोया-खली अस्वीकार हो गई थी.

यह बात उन्हें,हमें या सबको पता है.उनकी सबकी बात छोड़ें,हमारी ही सरकार इतनी ‘पत्थर-दिल’क्यों है कि हमारे यहाँ सेन्ट्रल इंसेक्टिसाइड बोर्ड,फ़ूड सेफ्टी स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी है.और ऊपर से छोटी-छोटी बातों के लिए मरने-मारने वाले या लड़ने वाले राजनेता हैं.सबसे अधिक चैतन्य व सक्रिय मीडिया के होते और सारे दावों-पुरावों,साक्ष्यों और अध्ययनों के होते हुए भी शांति है.जीवन के अस्तित्व से जुड़े इस प्रश्न पर किससे और कौन,क्या पूछे ?

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