चुनाव में अंदाज़ों के ‘अबूझमाड़’ बने हमारे गांव 

मैनेजमेंट वाले कहते हैं कि यदि आपने आपको मिला लक्ष्य पूरा कर लिया है,तो आप अपने बॉस की टेबल पर टांग रखकर भी बात कर सकते हैं,और थोड़ा भी चूक गए हैं,तो आप कितनी भी अच्छी या भरोसा कर सकने वाली दलीलें देंगे,तो भी कोई नहीं मानेगा.ठीक यही बात अभी ख़तम हुए विधानसभा चुनाव और उनके परिणामों पर लागू होती है. मध्यप्रदेश भाजपा के बड़े-बड़े ‘क्षत्रप’भले ही कहें कि हमें कुल वोटों के 41 .5 प्रतिशत वोट मिले,और कांग्रेस को 41 .1 प्रतिशत वोट ही मिले,तो भी उन्हें कोई तमगा नहीं दे देगा.अंतिम परिणाम में वे चुनाव हार गए हैं.हाँ,अंदाज़ों के ‘अबूझमाड़'(अबूझमाढ़ बस्तर का वह इलाक़ा है जिसका बड़ा हिस्सा अभी भी ‘अबूझा’ है)में फंसे हम सब लोगों को मान लेना चाहिए कि भाजपा में भी कांग्रेस से ज्यादा खतरनाक ‘क्षत्रपवाद’ है,और इस परिणाम में उसका बहुत बड़ा हाथ भी है.
मेरे सरीखे कई लोग मंदसौर में किसानों पर हुए गोलीकांड और मालवा-निमाड़ में हुए उग्र किसान आंदोलन के कारण चुनाव परिणाम की उम्मीद उसी अनुसार कर रहे थे.लेकिन,मंदसौर,नीमच और रतलाम की अधिकाँश सीटों पर भाजपा की जीत ने उस सोच को झूठा साबित कर दिया.इन्हीं जिलों से सड़कों पर प्याज,टमाटर,लहसुन फेंकने या सब्जी लगे खेतों में ‘गाडर’ (चारे-पानी की तलाश में राजस्थान से आने वाली भेड़ों को अपने यहाँ ‘गाडर’बोलते हैं) छोड़ने के फोटो रोज छपते रहे,किन्तु वोट तत्कालीन सरकार वाली पार्टी को ही मिले. किसानों सहित कई जानकारों से पूछा कि आखिर वह ‘जलजला’चुनाव में असर क्यों नहीं डाल पाया ?क्योंकि उसमें तो जानें गई थीं और सबकी आँखों के सामने लोक-संपत्ति का नाश हुआ था,तो  लगभग सभी का उत्तर था कि उस आंदोलन के सारे कर्ता-धर्ता बहुत जल्दी विश्वास खो बैठे,क्योंकि उनका राजनैतिक इरादा अलग से दिख गया था,या वे अपने-अपने ठिकानों पर बहुत जल्दी वापस लौट गए. चूँकि राजनीति संकेतों और संदेशों के साथ संदेह का खेल भी है,इसलिए रतलाम,मंदसौर और नीमच में हुए तमाम ‘जलजले’के बाद भी इस चुनाव में खड़े हुए कांग्रेस उम्मीदवार अपने ऊपर लगी पुरानी संदेह की छाया को नहीं मिटा सके,उनकी सरकारों में उनके व्यवहार सबको याद रहे,इसलिए परिणाम वह नहीं आया जिसका अंदाज़ दूर बैठे लोग,बाद की पुरानी घटनाओं और उनकी कड़वी यादों से जोड़कर लगा रहे थे. लेकिन,शेष मालवा-निमाड़,जहाँ उस आग की आंच कुछ ज्यादा ही आई थी,ने किसान आंदोलन की ‘धुरी’रहे क्षेत्रों से अलग परिणाम दिए हैं.
आप ही,अपने आस-पास के गाँव के लोगों से पूछ देखिये कि क्या किसी ‘वचन-पत्र’या ‘दृष्टि-पत्र’पर भरोसा कर उन्होंने वोट दिए थे ? लगभग सभी कहेंगे कि हममें भी इतनी समझ तो है,कि ये बातें शायद संभव नहीं हैं.इसके पहले हुई ऐसी ही बातों से,उन्होंने अपने ही आस-पास की को-ऑपरेटिव बैंकें डूबते हुए देखी हैं.लेकिन फिर भी,ऋण-मुक्ति की बात ने परिणाम को जरूर ही प्रभावित किया है. खरगोन के एक किसान ने बड़ी मासूमियत से कहा कि आखिर कितने दिन,एक ही एक चेहरा देखें ? पंद्रह साल,एक बड़ा कालखंड होता है. कहते हैं कि किसी बड़े नेता ने मालवा-निमाड़ की ज्यादा सीटें जिताने का ‘ठेका’ लिया था.किन्तु,अब उनका सन्देश है कि उनकी मर्जी के टिकिट नहीं बंटे.यही बात ग्वालियर-चम्बल के एक बड़े क्षत्रप कह रहे हैं,जहाँ के परिणाम भाजपा के लिए प्रतिकूल रहे हैं.अंदर की बात मानें,तो इन्होंने एक दो या तीन टिकिट जिद कर ले लिए,और एक दो को छोड़कर अपने उम्मीदवार तो जिता नहीं पाए,पर क्षेत्र के अपने मज़बूत विरोधियों को जरूर हरवा दिया.
खैर,ग्रामीण समाज की साफ़ समझ है कि हमारे यहां भी खाद,बीज,फसल के कम-दाम,मंडी का शोषण और कांदे-प्याज की वैसी ही समस्याएं हैं,जैसी पूरे प्रदेश में हैं.हम तो बस बरसों से प्रतिदिन दिख रहे स्थानीय चेहरे बदलना चाहते थे.
प्रदेश के सारे ग्राम-समाज में एक ही बात है कि इस चुनाव में न कोई लहर थी,और न ही कोई सितारा था.यह चुनाव विशुद्ध रूप से जातियों के बीच लड़ा गया था.पार्टियों का अपना ‘नेटवर्क’जरूर रहा,पर प्रयास पूरे के पूरे उम्मीदवारों के अपने थे. यदि अंदाज़ का यही आधार मान लिया जाए,तो भी यह मानना एक अबूझ पहेली ही है,कि जातीय आधार पर वोट करने वाले रीवा-शहडोल संभागों में अपेक्षा से अलग परिणाम क्यों आये हैं.हाँ,अंदर की बातों पर भरोसा करें तो भाजपा को भी रीवा संभाग में सफलता की ऐसी उम्मीद तो नहीं थी.यानी यह चुनाव वाक़ई अंदाज़ों का अजीब ‘अबूझमाड़’ है. कुल मिलाकर कुछ लोग यह जरूर कह सकते हैं कि न कोई हारा और न कोई जीता.किन्तु यह तो दिल को बहलाने की बात हुई.इस चुनाव में बीजेपी विशुद्ध रूप से हारी है.उसे बहुत-बहुत बड़ा नुकसान हुआ है. इस चुनाव में भाजपा ने जो पैसा खर्च किया,और जो पाया (परिणामस्वरूप सीटों के रूप में),वह अत्यधिक अविश्वसनीय रहा.चुनाव के लिए धन की प्राप्ति में आधिकारिक रूप से लिए जा सकने वाले ‘चुनावी बांड्स’ की कुल राशि का 97 प्रतिशत भाजपा को मिला था.
प्रचार या मीडिया की दुनिया में एक संस्था काम करती है ‘ब्रॉडकास्ट आडियेंस रिसर्च काउन्सिल’.उस संस्था के हवाले से इकोनॉमिक टाइम्स ने खबर छापी थी कि नवम्बर के दोनों पखवाड़ों में भाजपा ने विज्ञापन पर इतना खर्च किया कि देश के सबसे बड़े दस विज्ञापनदाताओं के साल भर के खर्च को भी उसने पीछे छोड़ दिया था. आख़िरी के चार दिनों में लगभग सौ दैनिक अखबारों को पूरे-पूरे मुखपृष्ठ (इनका सामान्य पृष्ठों की तुलना में दुगुना दाम होता है) के विज्ञापन जारी किये.टीवी और रेडियो पर भी ऐसे ही विज्ञापन जारी हुए.हालत यह रही कि उनके प्रतिद्वंदियों के लिए विज्ञापनों की जगह ही नहीं बची थी.माध्यमों को भाजपा के प्रतिद्वंद्वियों के विज्ञापन अस्वीकार करने पड़े. जानकार कहते हैं कि पिछले लोकसभा चुनाव में विज्ञापन पर जितना खर्च दोनों पार्टियों ने किया था,उतना इस बार अकेली भाजपा ने किया था.
हवा में तैरती उन बातों के खर्च तो मालूम ही नहीं,कि किसने कितनी स्कूटी,बाइक,फोर व्हीलर या टीवी बांटे.शराब और भाड़े के मजदूरों के जुलूस के खर्च तो एकदम अलग हैं.भाजपा के सबसे छोटे कार्यकर्ता से भी यदि पूछें,तो दबी जबान वह यह जरूर बोलेगा कि ‘इन हवाई जहाज़ों और हेलीकाप्टर वालों’ने ज्यादा टाइम और हवा खराब की . यानी,इतना खर्च कर,इतने कांटे में आना,बड़ी हार ही मानी जाना चाहिए,और सामने वाले की जीत स्वीकार की ही जाना चाहिए.भाजपा के रणनीतिकारों ने मान लिया था कि शहरों में बहने वाली हवा गाँव तक चली जायेगी,जो इस बार गई नहीं,और न जाने कैसा या जाति आधारित खेल हो गया. ऊपर से साफ़-साफ़ टुकड़े-टुकड़े दिख रही भाजपा को बांधकर रखने वाला संघ भी उतना सक्रिय तो नहीं दिखा,जितना कहा या बताया गया था(एक जगह,जहाँ उनके साथ धोखा हो गया था,व उनकी इज़्ज़त ही दांव पर लग गई थी को छोड़कर).
किसानी में लगे,लेकिन क्षेत्र की राजनैतिक-सामाजिक जानकारी रखने वाले,एक सज्जन ने कहा कि जमीनी स्तर पर संघ यदि गंभीर होता तो किसान आंदोलन के समय ही सरकार को गफलत में नहीं रहने देता,क्योंकि उनका तो चप्पे-चप्पे पर नेटवर्क है.उनके या सरकार के सूचना तंत्र को तब भी पहले से कहाँ पता चला था,जब हज़ारों किसानों ने ‘डंडों और कंडों’के साथ भोपाल को अगुवा कर लिया था ?
सबका एक कहना तो समान है,कि कांग्रेस की इस जीत से देश भर में फैले राजनीति के ‘इलाक़ाई गुंडे’अब शांत हो जाएंगे.
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