मप्र: कांटे की लड़ाई में जो जीता वही सिकंदर

कृष्णमोहन झा

मध्यप्रदेश के चुनाव परिणामों की घोषणा होने में कुछ घंटे ही शेष रह गया है। मतगणना की तिथि 11 दिसंबर जैसे -जैसे नजदीक आते जा रही है वैसे- वैसे उम्मीदवारों की धड़कने तेज होती जा रही है। मुकाबला प्रदेश में 15 वर्षो ने सत्तारूढ़ भाजपा और मुख्य विपक्षी कांग्रेस के बीच है। भाजपा यह मान चुकी है कि सत्ता की बागडोर चौथी बार उसके हाथों में आ रही है, जबकि कांग्रेस को 15 वर्षों के वनवास के समाप्त होने का सुखद अनुभव हो रहा है। चुनाव में जो रेकॉर्ड 75 फीसदी मतदान हुआ है उसे भी दोनों ही दल अपने पक्ष में मान रहे है। भाजपा को लगता है कि जनता ने 15 वर्षों के उसके काम को देखकर जोरदार समर्थन दिया है, वही कांग्रेस इसे भाजपा के कुशासन के प्रति जनता की नाराजगी बता रही है। राजनीतिक पंडित भी इस बढ़े हुए मतदान की व्याख्या अपने तरीके से कर रहे है। कुछ का मानना है कि बढ़ा हुआ मतदान सत्ता प्रतिवर्तन के लिए होता है तो कुछ इसे सरकार के प्रति जनता का अभूतपूर्व उत्साह बता रहे है।

खैर 11 दिसंबर को परिणाम जो भी हो किन्तु अबकी बार 200 पार बताने वाली भाजपा को अब यह चिंता सताने लगी है कि वह पिछले बार की तरह प्रदर्शन कर पाएगी। अब यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या भाजपा सत्ता के नजदीक पहुंचने से वंचित रह जाएगी। इधर यह भी मानना भी सही है कि कांग्रेस का प्रदर्शन पिछले तीन चुनावों के उलट बेहतर होगा। और यदि भारी मतदान को सरकार के खिलाफ मान लिया जाए तो 11 दिसंबर कांग्रेस के लिए सुखद पल लेकर आएगा। वैसे भी कांग्रेस यह सोचकर खुश हो सकती है कि इस चुनाव में खोने के लिए उसके पास कुछ नहीं था। चुनाव में कांग्रेस की एक कमजोरी का फायदा उठाने में भाजपा नहीं चुकी है कि वह भावी मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं प्रोजेक्ट कर पाई है जबकि भाजपा ने दोबारा फिर भाजपा फिर शिवराज के नारे को ही दोहराया।

कमलनाथ को पार्टी की बागडौर सौपने का फायदा निश्चित रूप से कांग्रेस को मिला ,लेकिन चार -चार कार्यकारी अध्यक्षों की नियुक्ति के बाद कार्यकर्ताओं में सीधे यह संदेश गया कि शीर्ष स्तर पर जारी गुटबाजी से निपटने के लिए यह नियुक्ति करने की नौबत आई । चुनाव के कुछ समय पूर्व दोनों ही दलों ने अपने प्रादेशिक अध्यक्षों को बदलने का फैसला किया था। निश्चित रूप से कमलनाथ का राजनीतिक कद भाजपा अध्यक्ष राकेश सिंह के मुकाबलें बड़ा है, लेकिन कांग्रेस इस तुलना का फायदा लेने से कही न कही चूक गई। पार्टी में कमलनाथ को सर्वेसर्वा अध्यक्ष के अधिकार नहीं दिए गए थे। पार्टी ने सिंधिया को चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाकर उनके समकक्ष बैठा दिया, लेकिन भाजपा में राकेश सिंह के हाथों में बागडौर होने के बाद भी सीएम शिवराज सिंह चौहान सर्वेसर्वा होकर उभरे। गौरतलब है कि पिछले दो चुनावों में शिवराज के पास भाजपा अध्यक्ष के रूप कुशल जोड़ीदार नरेंद्र सिंह तोमर साथ थे ,लेकिन इस बार उन्होंने प्रचार की बागडौर अपने हाथों में इस तरह कसकर पकड़ी कीं उससे यह अंदाजा स्वतः ही लग गया कि सत्ता और संगठन पर शिवराज का एकाधिकार मजबूत हो चुका है। इसके विपरीत कांग्रेस कमलनाथ के चेहरे पर ही दांव लगाने से बचती रही। इसे देखते हुए अब यह कैसे मान ले कि कांग्रेस की यदि सत्ता में वापसी हो जाती है तो मुख्यमंत्री के रूप में एक नाम पर सर्वसम्पति बनाने में पार्टी को कोई कठिनाई नहीं होगी। उस स्थिति में चुनाव पूर्व से ही समन्वय का काम देख रहे पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी। प्रदेश कांग्रेस में दिग्विजय सिंह की हैसियत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बसपा प्रमुख मायावती कांग्रेस से तालमेल नहीं होने का दोषी उन्हें ही ठहराती रही। मायावती ने जिस तरह से दिग्विजय सिंह को जिम्मेदार ठहराया है उससे यह संदेश नहीं मिलता कि मुख्यमंत्री के चयन में उनकी भूमिका भी अहम् होगी। हालांकि कमलनाथ एवं दिग्विजय सिंह पूर्व में कह चुके है कि वे सीएम की दौड़ में नहीं है। इस दृष्टि से तो सिंधिया का पलड़ा भारी होना चाहिए, लेकिन उनके प्रभाव क्षेत्र की सीमाओं को ध्यान रखते हुए उन्हें शायद मन मसोसकर रहना पड़ सकता है।

कांग्रेस को इस चुनाव में भाजपा की तुलना में बढ़त मिलते हुए दिखाई दे रही है तो उसकी असली वजह एन्टीइन्कम्बेंसी फेक्टर है, जिसे भाजपा का शीर्ष नेतृत्व भी दूर नहीं कर पाया है। यु तो इस समय पांच राज्यों की चुनाव प्रक्रिया चल रही है लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने मप्र के चुनाव को ही प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है इसलिए पार्टी ने अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की सभाएं ग्रामीण क्षेत्रों में भी आयोजित की। इससे यही सन्देश गया कि पार्टी को एन्टीइन्कम्बेंसी का भय सता रहा है।

इधर कांग्रेस ने शिवराज सरकार की असफलताओं और कमियों को चुनावी मुद्दा बनाने में तो कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन यदि वह किन्ही दो तीन प्रमुख मुद्दों पर फोकस करती तो उसे और अधिक बढ़त मिलने की संभावना बढ़ जाती। व्यापमं घोटाला ,कुपोषण एवं महिला हिंसा को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाने को लेकर कांग्रेस वह दिलचस्पी नहीं दिखा पाई जिसकी अपेक्षा उससे थी। मंदसौर गोलीकांड के बाद राहुल ने जरूर त्वरित दिलचस्पी दिखाते हुए सरकार पर तीखा हमला किया और यह घोषणा भी कर दी कि सरकार में आने के दस दिन बाद ही उनकी पार्टी की सरकार किसानों का कर्जा माफ़ कर देगी ,परन्तु किसानों के लिए बनी कल्याणकारी योजनाओं के बारे में बताने के लिए शिवराज सरकार के पास पहले से ही बहुत कुछ था। बेरोजगारी के मुद्दे पर भी कांग्रेस सरकार को उस तरह नहीं घेर पाई जिस तरह 2003 में भाजपा ने दिग्विजय सिंह की सरकार को बिजली, पानी व् सड़क के मुद्दे पर घेरा था। कांग्रेस भी यदि व्यापमं घोटाला ,कुपोषण एवं महिला हिंसा को उसी तरह मुद्दा बना लेती तो शायद वह और बढ़त बना सकती थी।

हालांकि भाजपा को चुनाव में जिस तरह से बागी बने अपने लोगों का भय सता रहा है उससे कांग्रेस बची हुई है। सरकार के मंत्री अपनी सीटें बचाने के लिए इस हद तक डूबे रहे कि पार्टी उनका उपयोग अन्य क्षेत्रों में नहीं कर पाई। मैदान में 63 बागियों की मौजूदगी ने पार्टी की चिंताओं को इस कदर बड़ा दिया था कि स्वयं मुख्यमंत्री को उन्हें मनाने के लिए कहना पड़ा कि ‘मै हु ना ‘। परन्तु इससे भी बात नहीं बनी। इन बागियों के कारण कई सीटों पर मंत्रियों एवं भाजपा उम्मीदवारों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है। कांग्रेस में भी पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी एवं पूर्व प्रदेशाध्यक्ष अरुण यादव ने भी अपने अपने क्षेत्रों में प्रतिष्ठा की लड़ाई में खुद को निरापद महसुस नहीं किया। कांग्रेस को इस चुनाव में स्टार प्रचारकों की कमी भी खलती रही जबकि भाजपा में पीएम मोदी राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह सहित अनेक केंद्रीय मंत्रियों एवं मुख्यमंत्रियों का जमावड़ा प्रदेश में बना रहा।

अब जबकि मतगणना के लिए कुछ ही दिन बाकी रह गए है तब दोनों ही प्रमुख दल यह गणित लगाने में जुट गए है कि यदि त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति बनती है तो किन दलों से सहयोग लिया जा सकता है। यु तो सपा, बसपा, आम आदमी पार्टी सहित सपाक्स ने भी जोर शोर से चुनाव लड़ा है ,लेकिन इनसे किसी बड़े उलटफेर की उम्मीद नहीं की जा सकती है। सपा ,बसपा ने ज्यादातर दोनों दलों के बागियों को उमीदवार बनाया वही सपाक्स ने एट्रोसिटी एक्ट को मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ा ,लेकिन बिना तैयारी के वे मतदाताओं को रिझाने में असफल नजर आए। खैर 11 दिसंबर का चुनाव परिणाम कांग्रेस के लिए सत्ता के दरवाजे खोल सकता है तो शिवराज सिंह का कद और भी बढ़ा सकता है। कांग्रेस यदि सफल हो जाती है तो उसके सामने चुनौतियां भी कम नहीं है। जिस तरह के वादे कांग्रेस ने किए है उसको पूरा करना आसान खेल नहीं है। शीर्ष स्तर पर छाई गुटबाजी भी नई सरकार की मुश्किलें बढ़ा सकती है। अगर भाजपा चौथी बार कामयाब होती है तो शिवराज निश्चित रूप से राज्य में ही नहीं बल्कि केंद्र में भी बड़े कद के नेता बन जाएंगे। इसका फैसला अब 11 दिसंबर को ही लेना है।

(लेखक IFWJ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और डिज़ियाना मीडिया समूह के राजनैतिक संपादक है)

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