खतरे में खेती और अविश्वसनीय बीमा योजना

भारतीय ग्राम-समाज को बहुत ध्यान से देखें,तो लगेगा कि वहां एक बड़े प्रतिशत में ऐसे लोग हैं,जो अपने जायज़ हक़ों और सुविधाओं के बारे में जानते ही नहीं,और,कोई उन्हें बताने के लिए ज्यादा गंभीर भी नहीं है.दूसरे वे हैं,जो जानते तो हैं,पर उन हक़ों को कैसे पाना है,उन्हें नहीं मालूम.तीसरे वे हैं,जो सब जानते हैं,पर अपने ही हक़ों को पाने के लिए उन्हें कीमत देनी पड़ती है.इस क़ीमत को देकर,वे कम नहीं,तो पर्याप्त भी नहीं पाते.यदि आप यह न पूछें,और मैं भी न बताऊँ कि यह कीमत किसे और कैसे दी जाती है,और मिलती है,तो काम चलेगा न ? यही कारण है कि ऊपर से कितनी ही अच्छी योजना बना लें,कितना भी बड़ा बजट बना लें,किन्तु नीचे जाकर ‘रायता ढुल ही जाता है’.फिर किसी हक़दार के हाथ कुछ नहीं आता.

अब हम कितनी भी बहस कर लें,चिंता कर लें या खून जला लें, पर धरती माता का बुखार ठीक नहीं कर सकते.इसी ‘ग्लोबल-वार्मिंग ‘ ने मौसम को अनिश्चित बनाया है.इस अनिश्चितता का पहला व सबसे बड़ा असर खेती-बाड़ी पर पड़ा है.अपनी कल्याणकारी सरकार ने इस अनिश्चितता से सुरक्षा के लिए ‘राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना’ बनाई थी,जिसे कुछ सुधारों के साथ वर्तमान सरकार ने ‘प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’नाम दिया है.हम मध्यप्रदेश वासी गर्व कर सकते हैं कि इस योजना की घोषणा फरवरी 16 में अपने यहाँ सीहोर में ही हुई थी.

लम्बे,हाँ काफी लम्बे समय तक,तो इस योजना के,नए बने नियम ही जमीन पर नहीं आ पाए थे.और,अऋणी (जो खेती के लिए कहीं से कर्ज नहीं लेते) किसान तो बहुत बड़ी मात्रा में आज तक इससे अछूते ही हैं.क्योंकि,उनका रेकार्ड,हालांकि रखा जाना चाहिए,पर कोई नहीं रखता.इसीलिए,अपने हक़ की जानकारी के अभाव में,वे इससे दूर ही हैं.इस योजना से अछूते और अऋणी किसानों का देश के सकल उत्पाद में अच्छा ख़ासा योगदान होता है.
दूसरे लगभग चालीस प्रतिशत किसान ऐसे हैं जिन्हें बैंकों,उनके सेवा केंद्रों या कृषि विभाग से जानकारी तो मिलती है,लेकिन कागज़ी ‘खाना-पूर्ति’ उनको भी बहुत भारी पड़ती है.सबसे बड़ी बात तो यह है कि दावों के निराकरण की प्रक्रिया कर्मचारियों सहित,किसी को भी ठीक से नहीं मालूम.जब दावों के चेक किसान के हाथ में जाते हैं तो ‘जग’भले हँसे पर किसान रो पड़ता है.अखबारों के आंचलिक प्रतिनिधि इन चेकों की फोटो अपने-अपने अखबारों में छपने भेजते हैं,तब हम सब देखते भी हैं.

अपना देश बहुत बड़ा है.इसमें कृषि उत्पादन और इस आजीविका से कितने लोग जुड़े हैं,आप अच्छे से जानते हैं.वर्षा,बाढ़ और सूखा से हुए नुकसान को भी आप जरूर जानते हैं.लेकिन,इस योजना में कुल बीमा दावे 31613 करोड़ के ही हुए.यह राशि यह बताने और समझने के लिए काफी है कि योजना की पहुँच और प्रचार की सीमा बिलकुल पर्याप्त नहीं है.जबकि बीमा कंपनियों को इसकी प्रीमियम 47408 रुपये की भरी गई. निपटाए गए दावों की स्थिति यह है कि अभी-अभी गए रबी और खरीफ के ही 2800 करोड़ रुपये की किसानों की देनदारी, कंपनियों के माथे पर है. किन्हीं सज्जन ने सूचना के अधिकार के तहत पाई जानकारी के अनुसार सन 16 -17 के ही 546 करोड़ के दावे निराकरण के लिए अभी तक शेष हैं.रबी 2017 -18 के अधिकाँश दावे लंबित हैं.यही नहीं सरकार ने भी जुलाई, 2018 में लोकसभा में यह बात स्वीकार की थी कि 2017 के कई क्लेम अभी भी बकाया हैं.

जबकि कहा तो यह गया था कि दूसरे सीज़न की बोनी के पहले,पहली फसल के नुकसान का बीमा मिल जाएगा.दुखदायी बात यह है कि सरकारें कहती हैं कि कम्पनियाँ दावे निपटाने में देरी करती हैं,और कम्पनियाँ कहती हैं कि सरकारें प्रीमियम देने में देरी करती हैं.यहाँ यह बात जरूर याद रखें कि व्यवस्था में ही तय है कि यदि कंपनी दावा देने में देर करेगी तो 12 प्रतिशत का ब्याज दावे के साथ किसान को देगी,और सरकार प्रीमियम देने में देर करेगी,तो वह प्रीमियम के साथ 12 प्रतिशत ब्याज कंपनी को देगी.लेकिन इससे उस किसान का कौन सा भला होना है,जिसे अपना सब काम तो निश्चित समय पर ही करना है. भरोसा कीजिये मेरे लिखने से,और मेरा लिखा आपके पढ़ने से,कोई क्रान्ति नहीं हो जायेगी.आप में से बहुत-बहुत कम लोगों की भागीदारी और रूचि राजनीति में होगी.लेकिन,यह जानने में क्या हर्ज़ है कि इस बीमा योजना में रिलायंस जनरल इंश्योरेंस,आईसीआईसीआई लोम्बार्ड,एसबीआई जनरल इंश्योरेंस,न्यू इण्डिया एश्योरेंस,एचडीएफसी और सरकारी क्षेत्र की एग्रीकल्चरल इंश्योरेंस कंपनी को काम मिला है.बाक़ी के लाभ तो अपनी जगह हैं,उनकी बात करना या उनके लाभ गिनना वर्जित हैं,पर सरकारी कंपनी ए आई सी ने ही इससे एक साल में 703 करोड़ रुपये का लाभ कमाया है.

सूचना के अधिकार के तहत पाई गई जानकारी पर भरोसा करें ( वैसे तो करना ही चाहिए),तो पाएंगे कि इन दो सालों में प्रीमियम के भुगतान की राशि में तो 350 गुना वृद्धि हुई है,किन्तु इस सुरक्षा चक्र में शामिल हुए लोगों की संख्या मात्र 0 .42 प्रतिशत ही बढ़ी है. योजना की औपचारिक घोषणा करते हुए वित्तमंत्री श्री अरुण जेटली ने कहा जरूर था कि इस योजना को ‘मिशन मोड’में लाएंगे.लेकिन,अभी तक मात्र 45 प्रतिशत दावे ही आना,चिंता में नहीं डालता ? कंपनियों,राज्यों और केंद्र सरकारों के अपने प्रीमियम के झगडे कब तक निपटेंगे ?

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