मध्य प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के शिल्पकार बने दिग्विजय सिंह

कृष्णमोहन झा
मध्यप्रदेश में डेढ़ दशक बाद सत्ता में वापसी करने में सफल हुई कांग्रेस ने 2003 के विधानसभा चुनाव में जो सोचनीय पराजय झेली थी ,उसकी नैतिक जिम्मेदारी तात्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने अत्यंत विन्रमता के साथ अपने कंधों पर ली थी। इस नाते उन्होंने दस वर्षों तक कोई भी पद नहीं लेने का संकल्प भी लिया था। इस दौरान मप्र में यह कयास बराबर लगते रहे कि कांग्रेस अब दोबारा सत्ता का स्वाद नहीं चख पाएगी। कांग्रेस का रास्ता वास्तव में इतना दुर्गम हो गया था कि यह अनुमान कभी कभी सही भी प्रतीत होता था। कांग्रेस में नेतृत्व के स्तर पर फैली गुटबाजी ने इस अनुमान को हमेशा  मजबूती ही प्रदान की। आखिरकार कांग्रेस ने सत्ता में वापसी तब की जब वे उसने अपनी इस कमजोरी पर विजय प्राप्त कर ली।
प्रदेश के आसन्न चुनाव को देखते हुए सारे गुटों में समन्यय स्थापित करने के लिए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की बागडौर कमलनाथ को सौप दी गई थी, परन्तु इस नियुक्ति के साथ ही चार चार कार्यकारी अध्यक्षों की नियुक्ति का फैसला भी सभी गुटों में समन्वय कायम करने के लिए किया गया, लेकिन इन गुटों में समन्वय कायम करने की कोशिश को सफल बनाया पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय ने, जिन्हे पार्टी की समन्वय  समिति के अध्यक्ष की महती जिम्मेदारी दी गई। समिति के अध्यक्ष के रूप में दिग्विजय सिंह का काम आसान नहीं था,परन्तु इस जिम्मेदारीपूर्ण काम को सफल बनाने की अपेक्षा भी केवल उन्ही से ही की जा सकती थी। दिग्विजय सिंह ने यह जिम्मेदारी बखूबी संभाली और ऐसी संभाली की कांग्रेस के हाथों में सत्ता की बागडौर आना सुनिश्चित हो गया। पूर्व मुख्यमंत्री की रणनीतिक कौशल ने सत्ताधारी भाजपा के दिग्गज रणनीतिकारों के भी सारे खेल बिगाड़ दिए।
इस दौरान  दिग्विजय सिंह की कार्यशैली पर समय समय पर भले ही सवाल उठते रहे हो, लेकिन उन्होंने अपनी मेहनत से कांग्रेस  की सत्ता में वापसी कराकर आलोचकों को न केवल निरुत्तर कर दिया ,बल्कि स्वयं को पहले से कही अधिक और प्रासंगिक बना दिया। उन्होंने चुनाव पूर्व ही यह घोषणा कर दी थी वे मुख्यमंत्री के पद की दौड़ में शामिल नहीं है। कांग्रेस ने जब विधानसभा चुनाव में बहुमत हासिल कर लिया तब भी वह अपनी घोषणा पर अटल रहे। चुनाव के बाद आगे उनकी भूमिका और महत्वपूर्ण होने वाली थी। मुख्यमंत्री पद के चयन को लेकर जब कांग्रेस हाईकमान को भी मुश्किलें आ रही थी तब उनके निवास में मंत्रणा का दौर चल रहा था, जिसमे सारी  निगाहें उन पर ही टिकी हुई थी। सारे नेता उनके मन की बात जानने को बेताब थे कि वे किसके सिर पर मुख्यमंत्री का ताज देखना चाहते है। गौरतलब है कि चुनावों के दौरान दिग्विजय सिंह ने एक बार भी यह नहीं कहा कि प्रदेश में मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी किसे सौपी जानी चाहिए। कांग्रेस हाईकमान ने जब कमलनाथ को मुख्यमंत्री पद की बागडौर सौंपने का फैसला किया तब उनकी सधी हुई प्रतिक्रिया से यह जाहिर हो गया कि वे भी कमलनाथ को यह जिम्मेदारी सौंपने के पक्ष में थे। राहुल गांधी के इस फैसले की घोषणा जब भोपाल गई तब दिग्विजय सिंह ने अपनी प्रतिक्रिया में थोड़े शब्दों में ही बहुत कुछ कह दिया। उन्होंने कहा कि कमलनाथ के नाम पर भला किसे आपत्ति हो सकती है।
दरअसल दिग्विजय सिंह ने प्रदेश में कांग्रेस की वापसी की उम्मीद कभी छोड़ी नहीं थी । 2003 में जब कांग्रेस 36 सीटों पर सिमट गई थी और राजनीतिक पंडित यह मानने लगे थे कि कांग्रेस को अभी और विपक्षी दल के रूप में रहना होगा, तब भी उन्हें भरोसा था कि कांग्रेस से सत्ता का वनवास भले ही लंबा खींच जाए लेकिन इसके बाद भी भाजपा से जनता की उम्मीदें पूरी नहीं होगी। अब जब पार्टी की सत्ता में वापसी हो गई है तब इस हकीकत को नकारना मुश्किल है कि दिग्विजय सिंह होने के क्या मायनें है। मौजूदा सरकार में अब उनकी राय हमेशा अहम् साबित होगी। मालूम हो उन्होंने टिकट वितरण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और उनके पसंद के उम्मीदवारों ने बड़ी संख्या में विधानसभा में प्रवेश किया है।
ऐसा प्रतीत होता है कि दिग्विजय सिंह ने मानो यह संकल्प ले रखा था वे प्रदेश में कांग्रेस की सत्ता में वापसी कराए बगैर चैन से नहीं बैठेंगे। पूर्ववती शिवराज सरकार पर किए गए उनके  हमलों ने सरकार को कई बार बचाव की मुद्रा में ला दिया था। शिवराज सरकार ने पूर्व मुख्यमंत्री को  मुखर होने से रोकने के लिए उपाय तो बहुत किए ,लेकिन इससे वे कभी विचलित नहीं हुए। इसके बाद उनके हमले पहले से और अधिक तीखे होते चले  गए। ऐसा नहीं है कि दिग्विजय सिंह को हर बार अपनी पार्टी का समर्थन मिला हो, परन्तु उनका पक्ष कभी गलत साबित नहीं हुआ।
पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की नर्मदा सेवा यात्रा के बाद जब दिग्विजय सिंह ने नर्मदा परिक्रमा करने की घोषणा की तब भाजपा के द्वारा उनपर तीखे तंज किए गए, किन्तु उन्होंने बिना विचलित हुए अपनी आध्यात्मिक निजी यात्रा का शुभारंभ किया और इस दौरान परिक्रमा पथ पर आने वाले ग्रामीण इलाकों की जनता का जो स्नेह अर्जित किया वह तात्कालीन भाजपा सरकार के लिए मुश्किल बन गया। एक तरह से कहे तो इस यात्रा ने कांग्रेस की सत्ता में वापसी की राह को आसान ही बनाया। दिग्विजय सिंह का कारवां ज्यों -ज्यों  आगे बढ़ता गया त्यों- त्यों कांग्रेस की सत्ता में वापसी बलवती होती गई। गौरतलब है की उनकी इस यात्रा के दौरान सभी वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं ने अलग-अलग पड़ावों पर पहुंचकर उनके प्रति न केवल अपनी आत्मीयता व्यक्त की ,बल्कि यात्रा में उनके हमसफर भी बने रहे। प्रदेश के नए मुख्यमंत्री कमलनाथ ने तो उनकी यात्रा को कठोरतम तपस्या तक निरूपित किया था।
चुनाव के नजदीक आते ही दिग्विजय सिंह ने समन्वय समिति के अध्यक्ष के रूप में प्रदेश के लगभग सभी जिलों का दौरा कर सभी नेताओं को एकजुटता के सूत्र में जुटने के लिए प्रेरित किया। उनकी इस यात्रा का स्थानीय कार्यकर्ताओं और नेताओं पर अनुकुल प्रभाव पड़ा ,जिसके कारण उन्होंने सत्ता में वापसी के लिए कमर कस ली। नतीजा सामने है। पार्टी का सत्ता से डेढ़ दशक का वनवास समाप्त हो चुका है। पार्टी के कार्यकर्ता उत्साह से भरे हुए है। उनका मनोबल इतना बढ़ गया है कि आगामी लोकसभा चुनाव में उन्हें पार्टी की संभावनाएं बलवती दिखाई देने लगी है। दिग्विजय सिंह भी पिछले 15 वर्षों में इस समय सबसे अधिक ताकतवर दिखाई दे रहे है। वे भले ही मुख्यमंत्री न हो, लेकिन वर्तमान मुख्यमंत्री कमलनाथ के लिए उनकी राय शायद सबसे अहम है। यही दिग्विजय होने के  मायने है।
चुनाव के दौरान समन्वय समिति के अध्यक्ष रहे दिग्विजय सिंह की जिम्मेदारी में अब बढ़ोतरी होना तय है। मुख्यमंत्री कमलनाथ स्वयं ही कह चुके है कि वे दिग्विजय सिंह से राय लेकर ही महत्वपूर्ण मसलों पर फैसला लेंगे। इससे यह संदेश मिलता है कि दिग्विजय सिंह परोक्ष रूप से सत्ता के दूसरे केंद्र के रूप में उभरेंगे। उन्होंने मुख्यमंत्री पद की महत्वाकांक्षा से भले ही खुद को अलग रखा हो परन्तु मंत्रीमंडल के गठन से लेकर प्रशासनिक फेरबदल में दिग्विजय सिंह फेक्टर कितना प्रभावी होगा उसकी झलक जल्द ही सामने आ जाएगी। कमलनाथ को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपने के पीछे उद्देश्य यही था कि वे कांग्रेस को सत्ता में वापसी कराने में सफल होंगे। अब इस उद्देश्य की पूर्ति के बाद इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि प्रदेश कांग्रेस की जिम्मेदारी किसी अन्य वरिष्ठ नेता को सौप दी जाए। कमलनाथ स्वयं भी यही चाहेंगे कि नए प्रदेशाध्यक्ष के साथ उनका तालमेल इस तरह बैठ जिससे आगामी लोकसभा चुनावों में पार्टी की शानदार विजय का मार्ग प्रशस्त कर सके। क्या अब इस संभावना को कोई ख़ारिज कर सकता है कि दिग्विजय सिंह की पसंद को नए प्रदेशाध्यक्ष की नियुक्ति में सर्वोपरि नहीं माना जाएगा ।
(लेखक IFWJ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और डिज़ियाना मीडिया समूह के राजनैतिक संपादक है)
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