‘हरी’ और ‘पीली’के बाद अब ‘सफ़ेद’ क्रान्ति का संकट

हमारे देश में जब भी आम-आदमी के जीवन सुधारने का कोई भी सरकारी कार्यक्रम शुरू होता है,तो उसे ‘क्रांति’का नाम दिया जाता है.कृषि उत्पादन बढाकर,देश को खाद्यान्न उत्पादन में आत्म-निर्भर बनाने के उद्देश्य से,पहले आई थी ‘हरित क्रांति’.यह अलग-अलग प्रकारों में आज भी जारी है,और यह रोज हमारे खेतों में आकर नए-नए दृश्य भी दिखाती है. ‘क्रांतियां’चूँकि सब कुछ बदल देती हैं,इसलिए इस ‘हरी-क्रान्ति’ने भी हमारे यहाँ खाद्यान्न के उत्पादन से लगाकर उपभोग तक,सब कुछ बदल कर रख दिया.भले ही पृथ्वी से लगाकर पर्यावरण तक,सब बीमार हो गए हैं,पर,सबके घर पैसे से तो भर ही गए हैं. फिर,1970 में आई ‘श्वेत-क्रान्ति’.दूध उत्पादन व उपलब्धि में प्रभावी योगदान कर,वाक़ई इसने ग्रामीण अर्थ-व्यवस्था व शहरी स्वास्थ्य सुधारने में कमाल के परिणाम दिए थे.हमारे मध्यप्रदेश में,आप गर्व से कह सकते हैं कि आजकल गाँवों में पानी का संकट हो सकता है पर पैकेट का दूध मिल ही जाएगा.

इसके बाद 1980 में आई ‘पीली-क्रांति’.खाने के तेल और तिलहन उत्पादन बढ़ाने,भोजन में ज्यादा प्रोटीन,या उन पर अभी खर्च हो रहे बहुत से डालर बचाने का,एक बड़ा सपना इसमें देखा व दिखाया गया था. ‘हरी-क्रांति’के दुष्परिणाम बहुत-बहुत बार चर्चा में आ चुके हैं,व अब ये मानव-जीवन से भी खेलने लगे हैं.बेचारी ‘पीली-क्रांति’तो ठीक से अपने पाँव पर खड़ी होने के पहले ही,सरकारी अदूरदर्शिता,अनीति,अज्ञान और अहंकार के कारण मर गई.मध्य प्रदेश के विभिन्न भागों में बंद पड़े या ‘भंगार’की तरह खड़े,निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के सोयाबीन साल्वेंट कारखाने,इस क्रांति की मृत-देह जैसे पड़े-पड़े,हमें मुंह चिढ़ा रहे हैं.
ये क्रांतियां जब भी बीमार होती हैं,या मरती हैं,तब कई जिंदगियां भी बर्बाद करती हैं.सरकारें हथियाने और वोट लूटने के हल्ले में,बर्बादी की सिसकियाँ गुम हो जाती हैं,या अनसुनी होकर,वे भी मर जाती हैं. इसी साल फिर वोट पड़ेंगे,सरकारें लूटी जाएंगी,हल्ला होगा,और सोयाबीन की इल्ली-कीड़े-मक्खी और बीमारी से बर्बाद हो चुके किसान की सिसकी वापस अनसुनी ही रह जायेगी.

अभी ही मैंने 19 सितम्बर,18 का इंडियन एक्सप्रेस अखबार देखा.इसकी एक खबर से मैं तो कांप ही गया.न जाने कितनी और कैसी-कैसी अनहोनी की कल्पनाओं मात्र से अचानक एक डर सा बैठ गया. खबर के मुताबिक़ भारत सरकार ने सभी राज्य सरकारों से कहा था कि वे स्कूलों के मध्यान्ह भोजन में दूध जरूर दें,ताकि भोजन की पौष्टिकता और गुणवत्ता बढे.राज्यों ने मानव संसाधन विभाग के उस पत्र पर सैद्धांतिक सहमति तो जाहिर की है,लेकिन यह भी साफ़-साफ़ कहा है कि उनकी आर्थिक स्थिति इसे जारी रखने की अनुमति नहीं देती.इसी मामले में,केंद्र सरकार के शिक्षा व साक्षरता विभाग ने कहा है कि वह भी अभी इस मामले में राज्यों की मदद करने की स्थिति में नहीं है.

इस खबर से उन सभी लोगों को जोरदार झटका लगेगा,जो डेरी-सहकारिता या दुग्ध उत्पादक किसानों के बारे में कुछ भी जानते,समझते,सोचते या चिंता करते हैं.मध्यप्रदेश में अभी तक,या अभी भी मध्यान्ह भोजन योजना में मीठे-फ्लेवर युक्त दूध पाउडर की आपूर्ति का ज़िम्मा सहकारी दुग्ध संघों के पास था,व इसीके कारण, एकाध को छोड़कर सभी सहकारी दुग्ध-संघों ने,अपने पुराने सारे घाटों को धो-पोंछ कर लाभ की स्थिति बना ली है.

अखबार की खबर में लिखा है कि सारे सहकारी डेरी संघों के पास अभी तीन लाख मीट्रिक टन ‘दूध-पाउडर’ और मक्खन का भण्डार है,और इसकी बड़ी व एकमात्र ग्राहक राज्य सरकारें या उनकी मिड-डे मील योजना ही है.नयी परिस्थिति में,सरकारें यदि पीछे हटती हैं,जैसे केंद्र और राज्य की चिट्ठी-पत्री से लगता है,तो सारे समीकरण बदल जाएंगे. दूध-संघों को,पहले से अपने पास रखा माल भी बाज़ार में ही लाना होगा,और किसानों से रोज की खरीदी भी जारी रखनी होगी.ऐसी स्थिति में भाव तो गिरेंगे,किसान अलग से परेशान हो जाएगा. राज्य सरकार ने वर्ष 15 -16 में 5500 मी.टन मीठा दूध पाउडर खरीदा था.16 -17 में 4100 टन और 17 -18 में 3800 टन पाउडर लिया था.इसलिए मान लीजिये कि केंद्र और राज्य के बीच का पत्राचार,भविष्य के लिए,खतरे की छोटी-मोटी घंटी नहीं है.

वर्ष 2015 से मध्य प्रदेश की दुग्ध सहकारिता को मिड-डे मील योजना में दूध पाउडर आपूर्ति का काम मिला था.दुग्ध संघों को इसमें शक्कर और कोई भी ‘फ्लेवर’ही मिलाना था,ताकि यह बाजार में न बिक जाय. दुग्ध संघों के लिए यह एक बेहद फायदे का व्यापार था,जिस कारण अति-आत्मसंतोष में,वे अपने मूल सहकारी ‘चरित्र’से ही दूर हो गए.उनकी गांव-गाँव में चलने वाली विस्तार और सहकारी गतिविधियां भी इस कारण पिछड़ गईं.संघ व समिति का सहकारी रिश्ता सीमित सा हो गया.सरकार से मिले व्यापार और उससे हुए लाभ को पाकर वे भी ‘कारपोरेट’हो गए थे. सहकारिता क्षेत्र में कोई भी संस्था हो,उसकी जान और जीवन-दायिनी ताकत या खड़े रहने की चट्टानी जमीन गाँव-गाँव में फैली उसकी प्राथमिक समितियों ही होती हैं.लेकिन इस प्रकरण में तात्कालिक लाभ के चक्कर में वह जमीनी काम भुला ही दिया गया.

इन तीन सालों में मध्यप्रदेश के दूध संघों ने अपने अन्य उत्पादनों के लाभकारी विपणन की कोई वैकल्पिक योजना या नीति ही नहीं बनाई.नए बाज़ार ही नहीं तलाशे या नए उत्पाद या नए ग्राहक ही नहीं बनाये.या साफ़ साफ़ कहें कि इधर ध्यान ही नहीं दिया.
सहकारी गतिविधि या ग्रामीण विस्तार गतिविधि के न रहने से चारे और पशु आहार में,जरूरत के मान से साठ प्रतिशत की कमी आ गई है.उनके भाव,दूध के भाव से बिलकुल मेल नहीं खा रहे हैं,इसलिए दूध उत्पादक किसान भी घाटे में आ गया है,जबकि संस्था वाले अपने पास रखे दूध पाउडर को सरकार में खपा कर खूब खुश हैं. ऐसा नहीं है कि सरकार का सहयोग हटने की आशंका पहली बार हुई है.इसके पहले दूर-दराज के ग्रामीण इलाक़ों से दूध लाने पर उन्हें परिवहन-सहायता मिलती थी,जो सरकार ने अचानक हटा ली थी.लेकिन तब,सारे दूध-संघ अपनी सहकारी गतिविधियों की तरफ  वापस मुड़े,और वहीँ की गतिविधियों से वापस आर्थिक सम्बल पाकर खड़े हो गए थे.

अब शायद वह वक़्त नहीं बचा है,क्योंकि देश का एक बड़ा दूध ब्रांड ‘अमूल’उज्जैन और भोपाल में तो पातंजलि इंदौर के पास पीथमपुर में और दिनशॉ सीहोर में कहीं बड़े-बड़े दूध कारखाने लेकर आ रहे हैं.इससे प्रतियोगिता बढ़ेगी और अंततः पुराने कमजोरों को ही नुकसान होना है. याद रखें किसी भी बाज़ार से सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम जब पीछे हटते हैं,तो उत्पादक और उपभोक्ता सबसे पहले और ज्यादा परेशान होते हैं.जिंदगियां अलग से बर्बाद होती हैं. यदि हम इन आशंकाओं को थोड़ा भी गंभीरता से लें,तो मध्य प्रदेश के ढाई लाख से ज्यादा दूध प्रदाय करने वाले किसानों की आजीविका संकट में आ सकती है.सत्तर चिलिंग प्लांट्स,लगभग पंद्रह खूब अच्छे से चल रहे छोटे-बड़े दूध संयंत्र और उनमें लगे करोड़ों करोड़ रुपये के जन-निवेश पर भी खतरा दिखेगा. ईश्वर करे ये आशंकाएं गलत हों,व चुनावी हो-हल्ले में यह बात भी उचित कानों तक पहुँच ही जाए.

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