आरबीआई और सरकार में इस वजह से है रार

नई दिल्ली। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) और सरकार के बीच टकराव की जो स्थिति अब सामने आई है, वह पिछले कई महीनों से चल रहे गतिरोध का नतीजा है। शुक्रवार को आरबीआई के गवर्नर ऊर्जित पटेल का बचाव करते हुए बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य के सरकार पर सीधे हमला किया, जिसके बाद यह पूरा मामला लोगों के सामने आ गया। आचार्य ने अपने इस बयान में बैंक की स्वायत्ता का भी बचाव किया। उन्होंने कहा कि अगर बैंक की स्वायत्ता नहीं बचाई गई तो वित्तीय संकट की स्थिति पैदा हो जाएगी। हालांकि अभी तक सरकार की तरफ से इस बे में कोई स्पष्टीकरण नहीं आया है। सरकार और बैंक के बीच टकराव की पड़ताल पर एक नहीं बल्कि कई कारण सामने आते हैं, जिन्हें हम बारी-बारी से समझने की कोशिश करते हैं।

NPA पर आरबीआई के एक्शन से नाराज सरकार-  बैंकिंग सिस्टम में मौजूद एनपीए की समस्या से निपटने के लिए आरबीआई ने सरकारी बैंकों पर कई तरह की सख्ती कर दी है। एनपीए की समस्या से निपटने के लिए आरबीआई ने जिस प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन (पीसीए) को तैयार किया है, उसमें उसने कुल 12 बैंकों को रखा हुआ है, जिसमें से 11 सरकारी बैंक हैं। पीसीए में आने की वजह से आरबीआई ने इन बैंकों के नए कर्ज देने, नए ब्रांच खोलने और लाभांश वितरण पर रोक लगा दी है। हालांकि सरकार इनमें से कुछ नियमों में ढील चाहती है। केंद्र सरकार चाहती है कि इन बैंकों को कर्ज देने से नहीं रोका जाना चाहिए ताकि आर्थिक विकास को मदद मिल सके। आचार्य के मुताबिक यह प्रतबिंध इसलिए लगाए गए ताकि बैंकों के बैलेंस शीट में आगे कोई और समस्या न आए। एनपीए को लेकर आरबीआई का नया नियम भी सरकार को परेशान कर रहा है। आरबीआई ने इस साल से नया नियम बनाया है, जिसके तहत अगर कोई भी कंपनी अगर निर्धारित समय से एक दिन बाद भी भुगतान करती है तो उसे डिफॉल्टर घोषित करना होगा। आरबीआई की यह कोशिश हालांकि पावर सेक्टर में एनपीए से निपटने की कोशिश रही है। सरकार के अधिकारी इस नियम में ढील देने के लिए लॉबिंग कर रहे हैं लेकिन उन्हें इस दिशा में सफलता नहीं मिल पाई।

लाभांश को लेकर-  विवाद सरकार का मानना है कि बैंकों की तरफ से आरबीआई को मिले लाभांश का अधिकांश हिस्सा उसे देना चाहिए। हालांकि आरबीआई ने ऐसा करने से मना कर दिया। आरबीआई का कहना है कि लाभांश में ज्यादा हिस्सेदारी मांग कर सरकार आरबीआई की स्वायत्ता पर प्रहार कर रही है, खासकर वैसे समय में जब आरबीआई को उसकी बैलेंस शीट को मजबूत करने की जरूरत है। वहीं सरकार को अगर ज्यादा लाभांश मिलता है तो उसे बजट लक्ष्य को पूरा करने में मदद मिलेगी। पिछले साल आरबीआई ने सरकार को 100 अरब रुपये सेस अधिक का अंतरिम लाभांश दिया था।

पेमेंट रेग्युलेटर को लेकर विरोध – आरबीआई ने सरकार की तरफ से गठित उस अंतर मंत्रालयी समिति की सिफारिशों का विरोध किया है, जिसमें एक अलग पेमेंट रेगुलेटर को बनाने की सिफारिश की गई है। आरबीआई का मानना है कि पेमेंट रेगुलेटरी बोर्ड को आरबीआई के अधीन रहना चाहिए, जिसकी कमान आरबीआई गवर्नर के हाथों में ही हो। 19 अक्टूबर को जारी नोट में आरबीआई ने कहा, ‘पेमेंट रेगुलेटरी बोर्ड का स्वरुप फाइनैंस बिल में बताई गई घोषणा के मुताबिक नहीं है।“

ब्याज दरों को लेकर रार – गौरतलब है कि पिछले कुछ महीनों के दौरान महंगाई में कमी आई है और यह मध्यम टर्म में आरबीआई के अनुमान के मुताबिक ही रहा है। हालांकि इसके बावजूद बैंक ने ब्याज दरों में कटौती की बजाए उसे बढ़ा दिया। सरकार रिजर्व बैंक से मौद्रिक सख्ती की उम्मीद नहीं कर रही थी लेकिन आरबाई ने अनुमानों को धता बताते हुए उसे बढ़ाने का फैसला लिया।

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