‘अन्न-स्वराज’ की हानि तो ‘जीवन की हानि’है

मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले में अभी-अभी,6 अक्टूबर से गांधी जी की 150 वीं जयंती की शुरुवात में ‘स्वराज-यात्रा’निकाली गई.जिले के यशस्वी पूर्वज स्व.माखनलालजी चतुर्वेदी की जन्मस्थली से निकली यह यात्रा,स्व.भवानी प्रसादजी मिश्र,स्व.डॉ.आर एच रिछारिया,स्व.हरिशंकर परसाई और स्व.अनुपम मिश्र सहित कई अन्य पूर्वजों की जन्मस्थली और कर्मस्थली तक गई.इस यात्रा में बड़ी ही शिद्दत से ‘अन्न स्वराज’की बात कही गई.अपने ही समय के गांधी-विचारक श्री कुमार प्रशांत ने गांधीजी की एक बहुत जरूरी बात बताई कि रोटी कपडा और मकान जिंदगी की सबसे जरूरी चीजें हैं,लेकिन,इनके साथ स्वाभिमान को भी जोड़ा जाना चाहिए. हम खुद ही सोचें कि हमारे अपने प्रतिदिन के विमर्श में ‘अन्न-स्वराज’ और ‘स्वाभिमान’ क्यों नहीं हैं.माना कि हममें से हर व्यक्ति खेती नहीं करता,हर व्यक्ति न गाँव में जन्मा है,और न कभी गाँव गया है.उसकी जिंदगी में सिर्फ महलनुमा’मल्टियाँ’,मोटर,मोबाइल और मौज ही है,लेकिन,वह खाता तो वही है न,जो खेत में पैदा होता है.गाँव से ही उसके खाने की सारी चीजें और चाय का दूध भी आता है.तो फिर ‘अन्न-स्वराज’की बात हमारी सबकी बात क्यों नहीं हो सकती.

स्व.प्रभाष जोशी ने एक बार लिखा था कि हमारे देश में चारों कोनों में अथाह और बेशकीमती पुरा-सम्पदा बिखरी पड़ी है.इसे देखकर लगता है कि हमारे पूर्वज मानसिक,बौद्धिक और आध्यात्मिक रूप से अत्यधिक श्रेष्ठ रहे होंगे.किन्तु फिर भी ये सभ्यताएं बर्बाद क्यों हुईं.जरूर कोई एक या दो पीढ़ियां गाफिल रही होंगी.और,लम्बे समय तक चली उनकी गफलतों ने उन चरमोत्कर्ष पर पहुंची सभ्यताओं को नेस्त-नाबूत हो जाने दिया.हमारे अपने आजकल के विलासी और काल्पनिक विमर्श को देखकर तो यही लगता कि हमारी दिशा और दशा भी उन्हीं पूर्वजों जैसी हो रही है. अपने देश की सरकारों, चाहे वे किसी भी दल की हों,ने खेती को मनोवैज्ञानिक और व्यावहारिक दृष्टि से आजाद तो नहीं रहने दिया है.सरकार फसलों के समर्थन मूल्य सारे देश के लिए एक ही घोषित करती है.कल्पना कीजिये,क्या कश्मीर से कन्याकुमारी तक,धान या गेहूँ की फसल-लागत एक ही आती होगी.बड़ी-बड़ी जोत वाले पंजाब और छोटी-छोटी जोत वाले मध्य प्रदेश में गेहूं की लागत एक ही हो सकती है क्या ? लेकिन,भारत सरकार द्वारा उनके लिए घोषित समर्थन मूल्य एक ही होते हैं,जो देश भर में लागू भी होते हैं.

राज्यों में भी तो चुनी हुई सरकारें हैं.उन्हें अपनी परिस्थियाँ बेहतर मालूम रहती हैं.पर उन्होंने यह बात कभी नहीं सोची.यह तो स्वराज की चोरी है.यानी ,ऊपर से चली आ रही ‘स्वतंत्रता की चोरी’में राज्य सरकारें भी शामिल हो गईं.उसके बाद यह स्वाभिमान की चोरी भी तो हुई ही है,कि फसल उगाई किसान ने,दाम सरकार तय करेगी.स्वाभिमान और स्वतंत्रता की यह चोरी वर्षों से जारी है,और हम फ़ोकट के विमर्शों में गाफिल हैं. इसी तरह खाद्य सुरक्षा का भी पूरे देश का एक ही कानून है.क्या कालाहांडी और रोहतक या गुड़गांव की खाद्य-सुरक्षा जरूरतें एक जैसी हैं ? समाज को एक जीवित मनुष्य और हम सबको उसके जीवित अंग मानने वालों को भी यह बात क्यों नहीं दिखी. कृषि कर्मण टाइप के पुरस्कार पाने के चक्कर में या उत्पादकता की शाबासी पाने के लिए सरकारें ऐसी फसलों और बीजों को प्रोत्साहित करती हैं,जिनके लिए पानी ज्यादा लगता है.क्या अब हमारे यहाँ नदियों,तालाबों और कुँओं में इतना पानी बचा है,या भूजल इतना है,कि हम उन फसलों को सींचकर अधिक उत्पादन ले सकें.हमने खूब लागत और मेहनत से फसल ऊगा भी ली,तो क्या उसका भाव हम खुद तय कर लेंगे,या अपनी मर्जी के अनुसार कहीं भी बेच सकेंगे ? इसे भी आप आजादी का हनन नहीं,तो क्या कहेंगे ?

व्यापार में एकाधिकार विरोधी तमाम कानूनों के रहते, आजकल दुनिया भर के 76 प्रतिशत बीज,खाद और कृषि-रसायन व्यवसाय पर मात्र पांच बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कब्ज़ा है.लेकिन उनकी लूट से हम शहरी एकदम अनजान हैं,पर यह जानते हैं कि उनके उत्पादन हमारे जीवन के लिए खतरा हैं. इस तरह की एक नहीं,पचास चीजें हैं,जो हमारे कृषि-स्वराज और अन्न-स्वराज,जो सीधे-सीधे हमारे जीने के अधिकार से जुड़े हैं,के लिए स्थाई खतरे बन चुके हैं.बहुराष्ट्रीय कंपनियों के इस बेज़ा दखल को ‘आजादी के अधिकार’ के साथ हमारे ‘जीवन के अधिकार’में भी दखल माना जाए. भारत का सुप्रीम कोर्ट,जो जीवन के अधिकार सम्बन्धी कई फैसले दे चुका है,से फिर से उम्मीद करें,कि वही और कुछ बोले.
अपने देश में 67 प्रतिशत किसान सीमान्त हैं,यानी उनके पास एक हेक्टेयर से कम जमीन है.अगले 18 प्रतिशत किसान छोटे हैं,मतलब उनके पास दो हेक्टेयर से कम जमीन है.इस तरह देश की 85 प्रतिशत जमीन अलग-अलग हाथों में है या जोतें बहुत ही छोटी हैं,और ये सब छोटे किसान अपनी हैसियत के मान से छोटे-छोटे निवेश ही करते हुए खेती कर पाते हैं.इसका परिणाम भी छोटा ही आएगा.इस स्थिति में स्वयं भगवान भी ऊपर से आ जाएँ,तो वे भी किसान की खेती से होने वाली आमदनी दुगुनी नहीं कर सकते.लेकिन,हम हैं कि खेती से आमदनी दुगुनी करने की बात पर भरोसा कर लेते हैं.

आप कुछ भी कहें,ये बातें हमारी कृषि-स्वतंत्रता और अन्न-स्वतंत्रता और जीवन के अधिकार के लिए अच्छे लक्षण नहीं हैं.अब तो डर लगता है कि हमारी अपनी व्यापक स्वतंत्रता भी सुरक्षित है या नहीं. महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती के निमित्त यदि यह बात उठी है,तो हम सबको इस पर चिंता से सोचना चाहिए.देखिये बीज,खाद,दवाई और यंत्रों के व्यापार में बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ छाई हुई हैं.वे किसी की भी ‘सगी’ नहीं हैं.बची बात जमीन की,सो विकास के नाम पर किसकी,कितनी और कौन सी जमीन पर,जनहित की कौन सी परियोजना आ जाए,भगवान भी नहीं जानता.मुआवजा पाकर भी किसानों की पीढ़ियों को बर्बाद होते हमने देखा है. दुःख इस बात का है कि ये खतरे हमको क्यों नहीं दिख रहे.इतिहास के गर्व और वर्तमान की धौंस के बीच में भविष्य कौन देखेगा.

ऐसा नहीं है कि ग्रामीणों की आय दुगुनी नहीं हो सकती.हो सकती है,पर अकेली खेती से नहीं.याद कीजिये कि किसानों की आत्महत्या के सबसे अधिक प्रकरण वहां के हैं,जहाँ आजीविका का अकेला साधन खेती है.जहाँ-जहाँ भी पशु पालन,मुर्गी पालन या अन्य रोजगार हैं,वहां स्थितियां तुलनात्मक रूप से अच्छी हैं.वहां आत्महत्या बिलकुल नहीं होती,क्योंकि लगातार कुछ न कुछ नगदी किसान के घर आती ही रहती है.इसलिए सरकारों को यह तथ्य देखकर जमीन पर तो आना ही होगा. राजनैतिक दल वोट पाने के लिए,और सरकारें अपनी छवि चमकाने के लिए,अपनी निगाह और अपनी समझ के हिसाब से खेती को देखती हैं.क्योंकि,उनकी बातें उनके अपने हित के लिए जरूरी होती हैं.लेकिन,वे बातें सम्पूर्ण ग्रामीण समाज की स्वतंत्रता में बाधक हैं.

गांधी,विनोबा,जयप्रकाश बाबू या दीनदयालजी शायद अब नहीं आएं.समाज का विमर्श ऐसे ही लोग बदलते हैं.किन्तु,बिना किसी सितारे का इंतज़ार किये,हम ही यह बात करना शुरू करें,तो क्या हर्ज है. सबसे पहले हम सबको मानना ही पड़ेगा कि शहर और गाँव अलग-अलग नहीं हैं.गाँवों की आजादी यदि आज खतरे में है,तो शहर पर भी वह खतरा आज नहीं तो कल आएगा ही.क्योंकि,आप कुछ भी करें,कहीं भी रहें,आपको रोटी -सब्जी-दाल-चांवल तो खाना ही है.और ये सब खेत में ही ऊगते हैं. वे सब लोग हमारी आजादी के अपराधी हैं,जो बे-बात के,और अनुत्पादक या फ़ालतू के मुद्दे लेकर टाइम खराब कर रहे हैं,या वोट की जुगाड़ में लगे रहकर हमारी जान से ही खेल रहे हैं.प्लीज उस दिन की प्रतीक्षा न करें,जब हमारी आजादी ही हमसे कहे “मी टू”.

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