NDA: बीजपी से बिछड़ते साथी बारी बारी

कृष्णमोहन झा

हाल ही में पांच राज्यों की विधानसभा के संपन्न हुए चुनाव में मध्यप्रदेश,राजस्थान एवं छत्तीसगढ़ में भाजपा के हाथों से सत्ता फिसल गई। केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद पहली बार एक साथ तीन राज्यों में भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा है। केंद्र में सत्तारूढ़ होकर जो पार्टी कांग्रेस मुक्त भारत का नारा देकर अपने को देश की सबसे ताकतवर पार्टी साबित करने में लगी हुई थी,उसे इन तीन राज्यों में मिली हार से सदमा जरूर लगा है,लेकिन वे अपने हाव भाव से इसे दर्शा नहीं रही है। भाजपा ने अब कांग्रेस मुक्त भारत के नारे से किनारा कर लिया है। पार्टी को शायद अब अहसास हो गया है कि केंद्र में सत्तारूढ़ होने के बाद देश के 21 राज्यों में सत्ता का जो सुनहरा अवसर उसे मिला था, इसका यह मतलब नहीं था कि देशभर से कांग्रेस का नामोनिशान मिट जाएगा।

केंद्र में सत्तारूढ़ होने के बाद पार्टी आज पहली बार इतनी चिंतित दिखाई दे रही है कि उसे राजग के असंतुष्ट अन्य सदस्यों को मनाने का प्रयास करना जरुरी लगने लगा है। बिहार में सीटों के बटवारें पर बिहार के मुख्यमंत्री एवं जेडीयू प्रमुख नितीश कुमार एवं लोजपा प्रमुख रामविलास पार्टी के साथ हुई बैठक में भाजपा ने जो लचीला रुख अपनाया उससे यह साफ है कि पार्टी सहयोगियों को यह संदेश नहीं देना ही चाहती है कि वह आगामी लोकसभा चुनाव अकेले लड़ने में सक्षम है। गौरतलब है कि कुछ दिनों पूर्व ही राजग के एक घटक राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी के मुखिया उपेंद्र कुशवाह ने मोदी सरकार से इस्तीफा देकर बिहार के विपक्षी महागठबंधन में शामिल होने का फैसला किया है। कुशवाह ने यह आरोप लगाते हुए मंत्री पद छोड़ा है कि सरकार सामाजिक न्याय का एजेंडा छोड़ आरएसएस का एजेंडा लागु करने में लगी हुई है। यहां आश्चर्य का विषय यह कि जो उपेंद्र कुशवाह केंद्र में साढ़े चार साल मंत्री पद की सुविधाओं का लाभ लेते रहे उन्हें अंतिम 6 माह में यह महसूस क्यों होने लगा कि मोदी सरकार ने उनके आत्मसम्मान को चोट पहुंचाई है। वे अब यह आरोप लगा रहे है कि पीएम मोदी ने उन्हें अपनी केबिनेट में रबर स्टैंप बना कर रखा था तो उनसे यह सवाल पूछा जा सकता है कि वे साढ़े चार साल तक चुप क्यों रहे? वास्तविकता तो यह कि कुशवाह को ऐसी आशंका सताने लगी थी कि बिहार में सीटों के बटवारें में उन्हें वांछित सीटें मिलने की संभावनाएं नहीं है। ऐसे में उन्होंने राजग से रिश्ता तोड़ने में ही भलाई समझी। इसके बाद उनके पास महागठबंधन में शामिल होने के आलावा कोई विकल्प नहीं था, इसलिए उन्होंने ऐसा ही किया।

कुशवाह के राजग से अलग होने का लाभ उठाने से इधर राजग के अन्य सहयोगी लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान भी नहीं चुके। पासवान अच्छी तरह जानते थे कि अपनी पार्टी के लिए सौदेबाजी करने का इससे सुनहरा अवसर उन्हें नहीं मिलने वाला है । उन्होंने तुरंत अपने बेटे एवं सांसद चिराग पासवान इसके लिए सक्रीय करते हुए उन्हें बिहार में सीटों के बटवारें के लिए अधिकृत कर दिया। उधर चिराग पासवान ने भी सक्रीय होते हुए राफेल विमान सौदे की संयुक्त संसदीय समिति द्वारा जांच कराने की राहुल गांधी की मांग का समर्थन कर दिय, जिसके बाद तो भाजपा का चौकन्ना होना वाजिब था। तुरंत भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के साथ रामविलास पासवानस एवं चिराग पासवान की मुलाकात तय हो गई। इसमें नितीश कुमार को भी शामिल किया गया और लंबी चर्चाओं के बाद जो फॉर्मूला तय किया गया उसमे जेडीयू एवं लोजपा पूरी तरह फायदे में रही। चूंकि बिहार में गठबंधन को टूटने से भाजपा को बचाना था इसलिए उसे मजबूरी में त्याग करना ही पड़ा।

भाजपा ने बिहार में सीटों का जो बटवारें पर जो समझौता किया है उससे यह अनुमान लगाना कठिन नहीं कि पार्टी ने इसमें मन मसोसकर ही रजामंदी जताई है। गौरतलब है कि विगत लोकसभा चुनाव में राजग ने बिहार की जिन 31 सीटों पर जीत दर्ज की थी उसमे 22 सीटों पर भाजपा के उम्मीदवार जीते थे। सीटों के बटवारें में निश्चित रूप से भाजपा से ज्यादा जेडीयू एवं लोजपा को फायदा मिला है। विगत चुनाव में राजग से अलग होकर लड़ी जेडीयू को मात्र 2 सीटों पर जीत हासिल हुई थी , लेकिन वह अब अपने 17 उम्मीदवार उतार सकेगी वही 22 सीटें जीतने वाली भाजपा को अपनी 5 सीटें छोड़नी पड़ेगी। इस तरह उसके यदि सभी उम्मीदवार जीत भी जाते है तो भी बिहार से उसकी 5 सीटें कम ही हो जाएगी। इधर पासवान ने जहां राज्य सभा में अपनी सीट सुरक्षित कर ली है,वही बेटे को वह अपनी परंपरागत सीट हाजीपुर से लड़ाने का मन बना चुके है। इस सम्भावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि राजग के फिर सत्ता में आने के बाद वे अपने बेटे चिराग को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल कराने में सफल हो जाए।

बिहार में सीटों के बटवारें में जिस तरह से भाजपा ने समझौता किया है,अब उसी तरह का लचीलापन अब वह महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ समझौते में ला सकती है। राम मंदिर के मामले में जिस तरह शिवसेना ने उग्र तेवर अपना रखे है ,उसके पीछे पार्टी की रणनीति को समझाना कठिन नहीं है। वैसे तो भाजपा अध्यक्ष अमित शाह महाराष्ट्र में अपने कार्यकर्ताओं से कह चुके है कि वे अपने दम पर आगामी लोकसभा का चुनाव लड़ने को तैयार हो जाए, लेकिन तीन राज्यों में मिली हार से पार्टी अब आपने फैसले पर पुनर्विचार करने को तैयार हो जाए तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। कुल मिलकर अब यह माना सकता है कि राजग का साथ छोड़ने वाले दलों की संख्या को देखते हुए भाजपा अपने सहयोगी दलों के प्रति अतिशय विनम्रता के साथ पेश आने के लिए विवश हो सकती|

(लेखक IFWJ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और डिज़ियाना मीडिया समूह के राजनैतिक संपादक है)

शेयर करें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *