अंधों का हाथी हो गई है खेती-बाड़ी

अपने देश की एक पुरानी बोधकथा है कि कुछ अंधों को हाथी का वर्णन करना था.सबने अपने अपने हाथ में आये उसके अंगों को ही पूरा हाथी समझकर अपना अंतिम निर्णय दे दिया. समझ की इस दर्दनाक कमी के शिकार,वैसे तो अपने यहाँ कई विषय हैं,पर कृषि और ग्रामीण-गरीबी इनमें सबसे ऊपर रखे जा सकते हैं.अन्य विषयों के अधिकृत विद्वान,मेरी समझ की दरिद्रता के कारण मुझे क्षमा कर दें,क्योंकि उनका भी,अपने-अपने विषयों को लेकर,लगभग यही ख्याल होगा. अपने यहाँ हर व्यक्ति और हर सरकार अपनी मर्जी और दृष्टि से जीवन से जुड़े विषयों पर प्रयोग करते हैं.लेकिन,हालात कभी नहीं बदलते.खेती-किसानी पर तो एक कहावत फिट बैठती है कि इस मामले में ‘ऊँट पर बैठकर बकरी चराई जा रही है’.

भारत में खाद्यान्न सुरक्षा को लेकर कृषि उत्पादन,उसके उचित मूल्य पर उपार्जन,परिवहन,भण्डारण और वितरण की एक बड़ी व व्यवस्थित श्रंखला है.कानूनों के तहत ही बनी इस बड़ी श्रंखला में उत्पादक से लगाकर उपभोक्ता तक के हितों की स्पष्ट कल्पना है.ऊपर से नारे हैं,वादे हैं,दावे हैं और बड़ी-बड़ी योजनाएं भी तो हैं. तब भी सरकार से सीधे-सीधे जुड़ा तंत्र देश के कुल कृषि उत्पादन का औसतन लगभग 13 प्रतिशत ही खरीद पाता है.अपना देश दुनिया में शायद इकलौता देश होगा, जहाँ लगने वाली जरूरी चीजों के दाम मिलाकर आई कुल लागत और फसल बिक्री के दाम कभी मेल नहीं खाते.यानी ‘आगे मिट्टी पीछे धूल,जब देखो मूल का मूल’.इसीलिए सरकार को समर्थन मूल्य तय करने पड़ते हैं.
गेहूं,धान,दलहन-तिलहन और कपास की भाव-सुरक्षा या स्थिरीकरण के नाम पर एफसीआई (भारतीय खाद्य निगम),नाफेड और सीसीआई आते जरूर हैं,और बाज़ार में उनकी धमक भी महसूस होती है,पर वह धमक स्थाई और प्रभावी कभी नहीं होती.

अभी ही सरकार ने फिर से सोयाबीन के समर्थन मूल्य की समीक्षा की बात की है.फिर भी,आज के समर्थन मूल्य 3399 रुपये प्रति क्विंटल पर,प्रमुख सोयाबीन उत्पादक प्रदेशों मध्यप्रदेश,महाराष्ट्र या राजस्थान में,कहीं भी,इन पर तो सोयाबीन नहीं बिक रही है.यहाँ तक कि प्लांटों के दरवाजे पर भी यह भाव नहीं है. किसान जानता है कि मंडी में हल्ला करने से कोई मतलब नहीं है,सिर्फ वक़्त की बर्बादी ही होगी और मंडी के अफसर भी अगले दिन वापस आ रही उतनी ही भीड़ का अंदाज़ लगाकर अपने परिसर में जगह की जरूरत के मान से सबको समझा-बुझाकर गुस्से की आग को भड़कने नहीं दे रहे हैं.लेकिन,यह स्थाई इलाज़ नहीं है.चिंगारी भी तो आग का सबसे छोटा रूप ही होता है.हमने प्याज बेचने आये किसान को पिछले ही साल तड़फते देखा है.

कृषि उत्पादनों के उपार्जन,परिवहन,भण्डारण और वितरण में भारतीय खाद्य निगम के पास कानूनन बड़ी जिम्मेदारियां हैं.ताज़ा ख़बरों के हिसाब से भारत सरकार की,भारतीय खाद्य निगम को देनदारी दो लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की हो गई है.इस पैसे के समय पर वापस न आने से खाद्य निगम को नेशनल स्माल सेविंग्स फण्ड से लगभग 9 प्रतिशत की ब्याज-दर से बहुत बड़ी रकम उधार लेनी पड़ी है.पहले से भ्रष्टाचार और बदइंतज़ामी से दोहरे हो रहे खाद्य निगम पर ऊँचे ब्याज दर की यह रकम बहुत बड़ा बोझ होगी.इस कारण आगे से,आपको खाद्यान्न के बोरे अधिक सड़ते दिखें या ज्यादा अन्न बिखरा दिखे तो आश्चर्य मत कीजिये.यही नहीं खाद्य निगम की इस आर्थिक स्थिति का प्रभाव उत्पादन से उपभोग तक की पूरी बड़ी और राष्ट्रव्यापी श्रंखला पर भी जरूर पड़ेगा.क्योंकि,पूर्व प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने यूं ही नहीं कहा था कि “पैसे पेड़ पर नहीं ऊगते”.
पुराने कई अनुभव रहे हैं कि कृषि उत्पादन में जब तक सरकारी खरीद होती है,तब तक किसान को उचित भाव मिलने की उम्मीद बनी रहती है.किन्तु सरकारें कोई न कोई कारण ढूँढ़कर,न जाने किस उम्मीद में,इस क्षेत्र में निजी व्या

 

पार को अधिक जगह देने की कोशिश करती ही रहती है.इन दिनों भी दबे-छिपे कोशिश हो रही है कि कृषि उपज मंडियों के अलावा,अन्य जगहों को भी कृषि उपज के व्यापार के लिए खोल दिया जाय. जिस देश में चिकित्सा और शिक्षा से लगाकर धर्म और आध्यात्म तक में,लूट गहराई तक घुस गई हो,वहां कानून का पालन करवाने वाली शक्तियों को कृषि उत्पादन और व्यापार से पीछे हटाना,बड़ी तबाही को निमंत्रण देना है.इसके पिछले कई उदाहरण हैं. भारतीय जनता पार्टी ने वर्ष 2014 के अपने घोषणा पत्र में कहा था कि कृषि उपज की बिक्री के लिए एक राष्ट्रीय बाज़ार बनाएंगे.आज चार साल बाद,अपना भी हक़ बनता है कि भले उनसे कुछ न पूछें,पर देखें तो सही कि हुआ क्या है ? अभी देश में कुल 6615 मंडियां हैं.इनमें से 585 में ही ई-नाम (इलेक्ट्रॉनिक नेशनल एग्रीकल्चर मार्केट) है.विश्वास कीजिये,इस मामले में जो भी आंकड़े हैं,वे सरकार के खुद के खुश रहने लायक भी नहीं हैं.इनसे अभी तक बहुत कम किसान जुड़े हैं.जबकि देश में दस करोड़ किसान हैं,व इनसे आधे ही मंडियों में आते हैं.अभी ही मंडियों में हुए कुल व्यापार का मात्र 2 प्रतिशत काम ‘ई-नाम’के जरिये होता है.यहाँ सवाल भरोसे का है.खरीदने और बेचने वाले दोनों पक्ष अभी इसके लिए तैयार ही नहीं हैं. बात मानिये,इससे ज्यादा पैसा तो इसके विज्ञापन पर खर्च हो गया होगा.शायद इसके ज्यादातर व्यवहार सरकारी सौदों के ही हैं.

भारत में औसत किसान के घर से मंडी 10 से 12 किलोमीटर दूर है.नए वित्तीय नियमों के अनुसार जरूरी नहीं है कि अपना माल बेचने आये किसान को हाथ के हाथ पैसे मिल ही जाएँ.यानी माल बेचने जाने वाले किसान को अपने घर से ही कुछ पैसे ले जाने होते हैं,ताकि हम्माली और तुलावटी की मजदूरी वहीँ की वहीँ नगद दी जा सके.अपने खुद के माल का पैसा बैंकिंग तंत्र से ही आएगा.उसके बाद फिर वापस शहर जाओ.उधारी पटाने,किराना या कपडा खरीदने या कोई बीमार है तो इलाज़ कराने.(जी हाँ,बीमारी को भी इलाज़ के लिए फसल बिक्री का इंतज़ार करना होता है).भविष्य के पेट में कुछ भी हो,पर आज तो ‘मन की आग’हाथ में पैसे न आने को लेकर लगी है. सोयाबीन,अपने यहाँ चूँकि मुख्य खरीफ फसल है,इसलिए उसके समर्थन मूल्य व बिक्री मूल्य की बात तो हो गई,किन्तु दालों,खासकर मूंग में तो तीस से पैंतीस प्रतिशत तक भाव समर्थन मूल्य से नीचे जा रहे हैं. इसलिए किसान ही कहता है कि ‘सरकार-बहादुर’खुद ही यह सुनिश्चित करा दे कि उसका माल समर्थन मूल्य पर ही खरीदा जाएगा.बाक़ी उसको कुछ नहीं चाहिए.लेकिन,यह तभी होगा,जब सरकार अपनी खुद की संस्थाओं या सहकारी संस्थाओं के साथ मंडी में या आसपास खरीदी के लिए तैयार खड़ी रहेगी. याद रखें खेती-बाड़ी में स्थितियां वहां पहुँच गई हैं,जहाँ से लौटना अब मुश्किल है.अट्टालिकाएं,बाग़-बगीचे,कारें,दफ्तरों की फाइलें,मोटरें,मोबाइल या तोप बंदूक खाये नहीं जा सकते.खाने के लिए अन्न ही चाहिए होगा.

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