दूध में दृष्टिदोष अच्छी बात नहीं है

परिवर्तन जिंदगी का एक जरूरी हिस्सा है.लेकिन,जीवन की अगली व्यवस्था और उसका अस्तित्व बने रहें,इसलिए आ रहे परिवर्तन के स्वभाव और परिणामों को,ठीक समय पर,और ठीक ढंग से देख पाना,किसी न किसी के जिम्मे तो आता ही होगा ? या फिर, उससे प्रभावित होने वाले हम ही उसकी चिंता क्यों न करें ? दूर न जाएँ,सिर्फ अपने ही आसपास की,व अपने ही समाज की बात कर लें,तो उचित होगा. आजकल के सामाजिक विमर्श की सबसे पहली सतह पर,जो भी मुख्य विषय हैं,क्या वे भविष्य के जीवन की सुरक्षा में सहायक हो सकते हैं ? राजनीति का वर्तमान स्वरूप,युद्ध की तरह लड़े जा रहे चुनाव,शासन,प्रशासन,चारित्रिक शुचिता या भ्रष्टाचार तभी तो संभव होंगे जब जीवन होगा.

आजकल अपने ही जीवन के अस्तित्व से खेलने वाले कुछ दुखदायी और डराने वाले आंकड़े देखें.अपने सारे खाद्य पदार्थों में से एक तिहाई पदार्थ उत्पादन और उपभोग के बीच खराब हो जाते हैं.शेष में अधिक लाभ के लिए,किसी न किसी स्तर पर,मिलावट होती है.अब तो डाक्टर समुदाय भी जिम्मेदारी से कहने लगा है कि देश के 57 प्रतिशत लोग,जिनमें 32 प्रतिशत बच्चे हैं,बीमार ही इसलिए पड़ते हैं कि उनके खाने की चीजों में मिलावट होती है.इस मिलावट से सिर-दर्द,उल्टी-दस्त,आँखों के रोग,पेट और किडनी के रोग तो होते ही हैं,कैंसर भी होता है. उगाने और भंडारण के दौरान कीटनाशकों,खरपतवारनाशकों,फफूंदनाशकों या अंकुरण रोकने वाले रसायनों से आई मिलावट के अलावा,बड़ी मात्रा में,अधिक लाभ के लिए,योजना बनाकर मिलावट होती है.यानी खाद्य पदार्थों को बाक़ायदा जहरीला बनाया जाता है. सबसे ज्यादा,68 प्रतिशत मिलावट दूध या दूध से बने पदार्थों में आ रही है.यह बात भी बड़ी जिम्मेदारी से,फ़ूड सप्लाई स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी की रिपोर्ट में आई है. पकड़े जाने पर दही और रबड़ी में ब्लॉटिंग पेपर(स्याही सोख),घी,पनीर और ‘चीज़’में आलू और वनस्पति तेल की मिलावट मिली हैं.इसके अलावा दूध में तो यूरिया सहित आलू,कास्टिक सोडा,डिटर्जेंट,फार्मलीन,हाइड्रोजन पेरोक्साइड,सोडियम क्लोराइड या कृत्रिम रंग भी मिले हैं.इन सब मिलावटों के अपराध क़ानूनन पंजीबद्ध हुए हैं.लेकिन फिर भी,मिलावट जारी है.

दूध की गुणवत्ता आधी करने वाली पानी की मिलावट की चर्चा मैंने नहीं की है.हम तो अभी उस मिलावट की बात कर रहे हैं,जो जहर बनकर हमारे घरों में आ रही है. फ़ूड सप्लाई स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ने हाल ही के कुछ वर्षों में,सारे देश के सभी कोनों से लगभग 1800 दूध के नमूने लिए थे.इनमें से 70 प्रतिशत नमूने मानक स्तर से बहुत नीचे के मिले थे. मैं जो भी बात कर रहा हूँ,उनमें से कोई भी बात,अपने किसी के लिए नई नहीं है.सब लोग,सब कुछ जानते हैं.बस, हम न तो आपस में ये बातें करते,और न ही उनसे करते,जिन्हें राज-काज का दायित्व दिया जाता है.तभी तो समाज का दर्पण बने सूचना माध्यम भी इनकी बातें नहीं करते.ऊपर से वे तो यह भी कहते हैं कि हम तो वही लिखते,छापते या दिखाते हैं जो जनता की पसंद हैं. कौन किससे पूछेगा कि मिलावट रोकने के काम के लिए तैनात अमला बहुत छोटा और कमजोर क्यों है.सार्वजनिक नियोजन और निवेश में ये विषय बहुत पीछे क्यों हैं.अकेले दूध की ही बातें करें,तो पाएंगे कि पिछले दस वर्षों में,जबसे ‘ऑपरेशन फ्लड’गया है,सब कुछ गड़बड़ है.एक ‘अमूल’ को छोड़कर,दूध के काम में लगे,सारे देश के सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम बीमार नहीं हैं,तो स्वस्थ भी नहीं हैं.

क्या आप जानते हैं कि भारत में चार करोड़ से कुछ ज्यादा गायें ‘जीवन से वंचित और मृत्यु से अस्वीकृत’अवस्था में हैं.इन्हें इस स्थिति में अधिक गर्भाधान,अधिक दुहे जाने और अधिक दूध के लिए अधिक रसायन ने पहुंचाया है,इनके आहार में जरूरत से 65 प्रतिशत की कमी भी उनकी दुर्दशा का एक कारण है.देश में पशु चिकित्सक भी जरूरत से आधे ही हैं.गायों,चाहे वे दुधारू हों या ना हों,के सुरक्षित व पर्याप्त आवास की व्यवस्था पर तो कहीं कोई बात ही नहीं होती.तभी तो ‘माता’होकर भी उसे सड़कों पर रहना पड़ता है. देश में स्वास्थ्य के प्रति निरंतर बढ़ रही चेतना,लोगों की बढ़ रही आमदनी और जीवन स्तर के परिवर्तन के साथ ही दूध की जरूरत तो बढ़ ही रही है,किन्तु उत्पादन नहीं बढ़ रहा है.इसीलिए मिलावट से,वह जरूरत पूरी करने का दुष्चक्र चल पड़ा है.क्योंकि अपनी गायों या पशुधन से ज्यादा उम्मीद नहीं की जा सकती.

यह सब बात इसलिए कि सरकार का कोई भी एक आंकड़ा,दूसरे आंकड़े से मेल नहीं खाता.भारत में आजकल ही दूध और दूध से बने पदार्थों का व्यापार 80 हज़ार करोड़ रुपये का है.इसका सबसे बड़ा खिलाड़ी ‘अमूल’ है.अब ‘अमूल’का लक्ष्य है कि उनका व्यापार 2020 तक 65 हजार करोड़ रुपये का हो जाएगा.उनके अलावा दूध व्यापार की विश्व की सबसे बड़ी कंपनी ‘लेक्टॉसिस’भी बड़े निवेश के साथ भारत आ रही है.रिलायंस,पेप्सी,कोका-कोला और गोदरेज एग्रोवेट की निगाह भी इस व्यापार पर है.माना कि इस घटनाक्रम से दूध की मांग बढ़ेगी और किसान को ज्यादा पैसा भी मिलेगा.लेकिन सवाल अभी भी वही है,कि खाद्यान्नों के व्यापार में बड़े उद्योग घरानों या बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आने से क्या फरक पड़ा है ? किसान भाव न मिलने से वैसे ही असंतुष्ट हैं व अधिक उत्पादन के चक्कर में हम पर्यावरण सहित कई चीजें बिगाड़ चुके हैं.

दूध के धंधे में आ रहे नए खिलाडियों के निवेश या पूँजी बाजार में उनकी मांग को पहली निगाह में देखकर लगता है कि यह सब कैसे होगा.क्योंकि चारा-भूसा,पशु-आहार है नहीं.इन चीज़ों के उत्पादन की जगह या तो खेती में आ गई,या आवासीय उपयोग में चली गई.घरों में गाय-भैंस रखने की जगह है नहीं.गाँव में पशु चिकित्सक हैं नहीं.तो फिर इसमें आगे होगा क्या ? कहीं यह सब आयोजन विदेशी दूध पाउडर के लिए नया बाज़ार बनाने के लिए तो नहीं हो रहा.
सरकारें विस्तार और विकास के मामले में जोर से कहना सीख गई हैं कि हमारे पास पैसे नहीं हैं.याद रखें,दूध पर हमें मानसिक रूप से ‘उबालने’अब कोई कृष्ण शायद ही आये.

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